अश्वगंधा

ashwagandha

अश्वगंधा खरीफ (अंतिम जुलाई से अक्टूबर तक) के मौसम में लगाया जाता है। अच्छी फसल के लिए जमीन में अच्छी नमी व मौसम शुष्क होना चाहिए। फसल सिंचित व असिंचित दोनों दशाओं में की जा सकती है। रबी के मौसम में यदि वर्षा हो जाए तो फसल में गुणात्मक सुधार हो जाता है। प्रजाति-पोशीता एवं रहितता नामक प्रजातियां उपयुक्त पायी गई हैं।

बुआई से पहले खेत की 2 बार जुताई कर लें। जुताई से पहले 4-5 क्विंटल देसी गाय के गोबर की खाद ,गौ मूत्र और नीम की खल्ली या करंज केक 50 किलोग्राम प्रति एकड़ खेत में डालें। बुआई के समय मिट्‌टी को भुरभुरी बना दें। बुआई के समय वर्षा न हो रही हो तथा बीजों में अकुंरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी हो। वर्षा पर आधारित फसल को छिटकवां विधि से भी बोया जा सकता है।

अश्वगंधा की फसल में किसी प्रकार की रासायनिक खाद नही डालनी चाहिए क्योंकि इसका प्रयोग औषधि निर्माण में किया जाता है।

बुआई के 20-25 दिन पश्चात्‌ पौधों की दूरी ठीक कर देनी चाहिए। खेत में समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए।पंक्ति की दूरी 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 सें. मी. की कर देनी चाहिए।

अश्वगंधा की फसल 150 से 170 दिन के मध्य खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधे की पत्तियां व फल जब पीले हो जाए तो फसल खुदाई के लिए तैयार होती है। पूरे पौधे को जड़ समेत उखाड़ लेना चाहिए।

प्रति एकड़ छिड़काव विधि से 3 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है। बीज के बुआई से पहले बीज में एक किलोग्राम ट्रायकोडर्मा या नीम के पत्तों से बना काढ़ा मिलाकर बुआई करें।

उपज- प्रति एकड़ दो क्विंटल 50 किलोग्राम सूखी जड़। करीब 25 किलोग्राम बीज और चार क्विंटल सूखा तना मिल जाता है।

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