सेम का उपयोग, फायदा एवं सेम की खेती

सेम (Cluster/Lima Beans) एक प्रकार की फलियां उगाने वाली लता है। सेम की फलियाँ विभिन्न आकार, रंगों (सफेद, हरी, पीली, आदि) और आकारों (लंबी, चपटी, टेढ़ी-मेढ़ी) में उपलब्ध होती हैं। सेम की फलियाँ स्वादिष्ट और पौष्टिक होती हैं, और इन्हें सब्जी के रूप में खाया जाता है। सेम फलियाँ दुनिया भर में उगाई जाती हैं, खासकर उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में।

सेम में पाए जाने पोषक तत्व ( Nutrients found in Cluster/Lima Beans )

सेम (बीन्स) कई पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जिनमें शामिल हैं:

विटामिन (Vitamins): फोलेट (Folate), थियामिन (Thiamin), राइबोफ्लेविन (Riboflavin), नियासिन (Niacin), विटामिन (Vitamin) B6, विटामिन C, और विटामिन K आदि।

खनिज (Minerals): आयरन (Iron), मैग्नीशियमMagnesium), पोटेशियम (Potassium), और जिंक (Zinc) आदि।

प्रोटीन (Protein): सेम (बीन्स) प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं, खासकर शाकाहारी लोगों के लिए।

आहारीय फाइबर (Dietary Fiber): सेम (बीन्स) में उच्च मात्रा में आहारीय फाइबर होता है, जो पाचन स्वास्थ्य, हृदय स्वास्थ्य और मधुमेह नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।

कम वसा (Low in Fat): अधिकांश फलियों में वसा कम होती है, जो उन्हें स्वस्थ आहार के लिए एक अच्छा विकल्प बनाता है।

जटिल कार्बोहाइड्रेट (Complex Carbohydrates): सेम (बीन्स) जटिल कार्बोहाइड्रेट का एक अच्छा स्रोत हैं, जो ऊर्जा प्रदान करते हैं और रक्त शर्करा के स्तर को स्थिर रखने में मदद करते हैं।

सेम के सेवन के स्वास्थ्यवर्धक फायदे ( Health Benefits of Consuming Beans )

समृद्ध पोषण प्रोफ़ाइल के कारण, बीन्स का सेवन विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है। अपने आहार में विभिन्न प्रकार की फलियाँ शामिल करने से समग्र स्वास्थ्य और खुशहाली में सुधार हो सकता है।

सेम (बीन्स) में पाए जाने वाले पोषक तत्व रक्त निर्माण, प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन, हड्डियों के स्वास्थ्य और अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सेम (बीन्स) प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं, जो उन्हें शाकाहारियों, शाकाहारियों और मांसाहारी लोगों के लिए एक मूल्यवान भोजन बनाता है। प्रोटीन मांसपेशियों की मरम्मत, विकास, ऊर्जा उत्पादन और संपूर्ण शरीर के कामकाज के लिए आवश्यक है।

सेम (बीन्स) में उच्च मात्रा में आहारीय फाइबर होता है, जो पाचन में सहायता करता है, स्वस्थ वजन बनाए रखने में मदद करता है, कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है और हृदय स्वास्थ्य का समर्थन करता है। अधिकांश फलियों में वसा कम होती है। अपने आहार में बीन्स को शामिल करने से आवश्यक पोषक तत्व और ऊर्जा प्रदान करते हुए कुल वसा और संतृप्त वसा का सेवन कम करने में मदद मिल सकती है।

म (बीन्स) जटिल कार्बोहाइड्रेट का एक अच्छा स्रोत हैं, जो धीमी गति से पचते हैं और ऊर्जा की निरंतर रिहाई प्रदान करते हैं। यह रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने और पूरे दिन निरंतर ऊर्जा प्रदान करने में मदद कर सकता है।

सेम (बीन्स) में उच्च फाइबर सामग्री, कम संतृप्त वसा और कोई कोलेस्ट्रॉल नहीं होता है, जो उन्हें हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद बनाता है। बीन्स के नियमित सेवन से हृदय रोग का खतरा कम हो सकता है।

सेम (बीन्स) में मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट और फाइबर रक्त शर्करा के स्तर को स्थिर रखने में योगदान करते हैं, जो मधुमेह वाले व्यक्तियों या रक्त शर्करा के स्तर को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने वाले लोगों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद हो सकता है। संतुलित आहार में सेम (बीन्स) को शामिल करना उन लोगों के लिए एक उपयोगी हो सकती है जो वजन कम करना या बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि वे कम कैलोरी और उच्च फाइबर प्रदान करते हैं।

सेम (बीन्स) में मौजूद फाइबर नियमित मल त्याग को बढ़ावा देकर और कब्ज को रोककर पाचन स्वास्थ्य का समर्थन करता है। यह आंतों में लाभकारी बैक्टीरिया के विकास का समर्थन करते हुए, स्वस्थ आंत माइक्रोबायोम में भी योगदान देता है।

सेम (बीन्स) में मौजूद फाइबर नियमित मल त्याग को बढ़ावा देकर और कब्ज को रोककर पाचन स्वास्थ्य का समर्थन करता है। यह आंतों में लाभकारी बैक्टीरिया के विकास का समर्थन करते हुए, स्वस्थ आंत माइक्रोबायोम में भी योगदान देता है।

सेम की खेती ( Cluster/Lima Beans Cultivation )

आइये आपको सेम की खेती में 2 तरह की प्रणाली के बारे में जानकारी दी जाये। पहला तरीके में आप प्राकृतिक तरीके से सेम की खेती कर सकते हैं और जैविक तरीके से भी।

1. प्राकृतिक तरीके से सेम की खेती ( Cluster/Lima Beans Cultivation in Natural Way )

प्राकृतिक तरीके से सेम (बीन्स) की खेती करना आसान है। बोन्साई प्रणाली आपको स्वस्थ और उत्तम उत्पादकता के साथ सेम की खेती करने में मदद कर सकती हैं।

सेम की खेती के लिए सही बीज का चयन करें।

बोन्साई प्रणाली का उपयोग करके बीजों को पौधों में बदलना सुनिश्चित करें। इससे पौधे मजबूत और स्वस्थ रहते हैं।

यह जल परिसंचरण, मिट्टी के स्वास्थ्य और बैक्टीरिया से सुरक्षा में मदद करता है।

सेम के पौधों को उचित सिंचाई प्रदान करना महत्वपूर्ण है। जल संरक्षण के लिए कपड़े में छेद वाली सिंचाई प्रणाली का प्रयोग करें।

सही मात्रा में प्राकृतिक खाद उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है। बहुत अधिक उर्वरक पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए स्थानीय मिट्टी के स्वास्थ्य और फसल की आवश्यकताओं के अनुसार उर्वरक का चयन करें।

प्राकृतिक कीटनाशकों और उर्वरकों का उपयोग करके रोग और कीट प्रबंधन में सहायता करें। प्राकृतिक तरीकों से पौधों की सुरक्षा के लिए हानिकारक कीटनाशकों से बचें।

फसल की नियमित निगरानी करें ताकि किसी भी समस्या का तुरंत पता लगाया जा सके और उचित समाधान किया जा सके।

सेम की खेती में मिट्टी की जानकारी ( Soil Information in Cluster/Lima Beans )

मिट्टी का प्रकार: सेम की खेती हल्की दोमट और रेतीली मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है, लेकिन जल निकास वाली दोमट और रेतीली मिट्टी इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है।

पीएच मान: सेम की खेती के लिए भूमि का पीएच मान 5.5 से 6.0 के बीच होना चाहिए।

जल निकासी: मिट्टी में जल निकासी अच्छी होनी चाहिए। यदि जल निकासी अच्छी नहीं है, तो पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं

पोषक तत्व: मिट्टी में सभी आवश्यक पोषक तत्व होने चाहिए। यदि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी है, तो पौधों की वृद्धि धीमी हो सकती है और उत्पादन कम हो सकता है।

सेम की खेती में बुवाई और बुवाई का समय ( Sowing and Sowing Time to Plant Cluster/Lima Beans )

उत्तर-पूर्वी राज्य: इन राज्यों में सेम की बुवाई अक्टूबर से नवंबर के महीने में की जाती है।

अन्य स्थान: कुछ स्थानों पर सेम की बुवाई मध्य सितंबर तक की जाती है।
पहाड़ी इलाके: पहाड़ी इलाकों में सेम की बुवाई जून और जुलाई में की जाती है।

बीज की गहराई: बीज को 2 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए।

यहाँ कुछ अतिरिक्त सुझाव हैं (Here are Some Additional Tips):

तापमान: सेम के बीजों को अंकुरित होने के लिए 20 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है।

मिट्टी: मिट्टी अच्छी तरह से तैयार की गई होनी चाहिए और उसमें जल निकासी अच्छी होनी चाहिए

बीज का चयन: अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करें जो आपके क्षेत्र के लिए उपयुक्त हों

बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को उचित उपचार दें।

यह भी ध्यान रखें:

स्थानीय जलवायु और मिट्टी की स्थिति के अनुसार अपनी खेती विधि को अनुकूलित करें। अनुभवी किसानों और कृषि विशेषज्ञों से सलाह लें। नए तरीकों और तकनीकों के बारे में जानकारी प्राप्त करें।

सेम की खेती में खाद और पानी कब और कैसे डालें ( When and How to Apply Fertilizer and Water in Cluster/Lima Beans Cultivation )

सेम के बीज 10 से 12 दिनों के बाद अंकुरित होने लगते हैं। जब बीज अंकुरित होने लगें तो आप नियमित अंतराल पर खाद और पानी डालते रहें। उर्वरक के रूप में आपको केवल जैविक खाद का ही प्रयोग करना चाहिए, रसायनों का नहीं।

यहाँ कुछ अतिरिक्त सुझाव हैं (Here are Some Additional Tips):

जैविक खाद जैसे कि गोबर की खाद, कंपोस्ट, और वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करें। मिट्टी को हमेशा नम रखें, लेकिन गीली नहीं। नियमित रूप से निराई-गुड़ाई करें। प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करें।

प्राकृतिक खेती में बोन्साई प्रणाली क्या है? ( What is Bonsai System in Natural Farming? )

बोन्साई प्रणाली (Bonsai System):

यह एक जापानी कला है जिसमें छोटे पेड़ों को गमलों में उगाया जाता है। यह कला प्रकृति के प्रति सम्मान और धैर्य का प्रतीक है।

प्राकृतिक खेती में बोन्साई प्रणाली (Bonsai System in Natural Farming):

यह एक ऐसी प्रणाली है जिसमें बोन्साई कला के सिद्धांतों को प्राकृतिक खेती में लागू किया जाता है। यह प्रणाली मिट्टी की उर्वरता और जल संरक्षण में सुधार करती है।

बोन्साई प्रणाली के लाभ (Benefits of Bonsai System):

मिट्टी की उर्वरता में सुधार: बोन्साई प्रणाली में, पौधों को गमलों में उगाया जाता है। इन गमलों में मिट्टी में जैविक खाद और अन्य प्राकृतिक पदार्थ मिलाए जाते हैं। यह मिट्टी की उर्वरता में सुधार करता है।

जल संरक्षण: बोन्साई प्रणाली में, पौधों को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह जल संरक्षण में मदद करता है।

पौधों की वृद्धि में सुधार: बोन्साई प्रणाली में, पौधों को उचित धूप और हवा मिलती है। यह पौधों की वृद्धि में सुधार करता है।

कीट नियंत्रण: बोन्साई प्रणाली में, प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। यह कीटों से पौधों की रक्षा करता है।

बोन्साई प्रणाली का उपयोग कैसे करें (How to use Bonsai System):

मिट्टी का चयन: बोन्साई प्रणाली के लिए, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी का चयन करना महत्वपूर्ण है। मिट्टी में जैविक खाद और अन्य प्राकृतिक पदार्थ मिलाए जाने चाहिए।

पौधे का चयन: बोन्साई प्रणाली के लिए, एक ऐसे पौधे का चयन करना महत्वपूर्ण है जो गमले में उगाने के लिए उपयुक्त हो।

पौधे की देखभाल: बोन्साई प्रणाली में, पौधों को उचित धूप, हवा, पानी और खाद की आवश्यकता होती है।

बोन्साई प्रणाली प्राकृतिक खेती के लिए एक लाभकारी प्रणाली है। यह मिट्टी की उर्वरता और जल संरक्षण में सुधार करती है। यह पौधों की वृद्धि और स्वास्थ्य में भी सुधार करता है।

2. जैविक तरीके से सेम की खेती ( Cluster/Lima Beans Cultivation in Natural Way )

सेम की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी ( Climate and Soil for Cluster/Lima Beans Cultivation )

सेम की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे अच्छी होती है। सेम 20 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर अच्छी तरह से उगती है। सेम की खेती के लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है। मिट्टी में अच्छी जल निकासी होनी चाहिए।

सेम की उन्नत किस्में ( Improved Varieties of Cluster/Lima Beans )

सेम की खेती में वैसे तो मिटटी और जलवायु के अनुसार बीज का चयन करना चाहिए। उत्तरी भारत और दक्षिण भारत दोनों में जलवायु अलग होने की वजह दोनों की किस्में भी अलग हैं।

उत्तरी भारत (आर्द्र क्षेत्रों) के लिए सेम की कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार हैं:

पूसा सेम 2: यह एक अर्ध-लता वाली किस्म है जो 50 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 10 से 12 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

पूसा सेम 3: यह एक झाड़ीदार किस्म है जो 45 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 8 से 10 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म गर्मी और सूखे को सहन कर सकती है।

पंत सेम 1: यह एक अर्ध-लता वाली किस्म है जो 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 12 से 15 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली है।

पंत सेम 2: यह एक झाड़ीदार किस्म है जो 50 से 55 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 10 से 12 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

एचडी 118: यह एक अर्ध-लता वाली किस्म है जो 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, गोल और 12 से 15 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली और रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

अर्का जय: यह एक अर्ध-लता वाली किस्म है जो 55 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 10 से 12 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली और रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

अर्का विजय: यह एक झाड़ीदार किस्म है जो 50 से 55 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 8 से 10 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली और रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

दक्षिण भारत (शुष्क क्षेत्रों) के लिए सेम की कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार हैं:

कोयम्बटूर 1: यह एक अर्ध-लता वाली किस्म है जो 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 12 से15 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली है।

कोयम्बटूर 2: यह एक झाड़ीदार किस्म है जो 50 से 55 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 10 से 12 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

प्रभा: यह एक अर्ध-लता वाली किस्म है जो 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, गोल और 12 से 15 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली और रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

अरुणा: यह एक झाड़ीदार किस्म है जो 50 से 55 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियाँ हरी, चपटी और 8 से 10 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली और रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

एचडी 315: यह किस्म 65 से 70 दिनों में तैयार हो जाती है। फलियां हरी, चपटी और 12 से 15 सेमी लंबी होती हैं। यह किस्म उच्च पैदावार देने वाली और रोगों एवं कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

सेम की खेती में बुवाई ( Sowing in Cluster/Lima Beans Cultivation )

सेम की बुवाई जून से जुलाई महीने में की जाती है। बुवाई से पहले बीज को 24 घंटे पानी में भिगो दें। बुवाई के लिए 30 सेंटीमीटर चौड़ी और 10 सेंटीमीटर गहरी क्यारियां बना लें। क्यारियों में 10 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज बोएं। बीज को 2 सेंटीमीटर गहराई में बोएं।

सेम की खेती में देखभाल ( Care in Cluster/Lima Beans Cultivation )

सेम को नियमित रूप से पानी देना चाहिए। सेम को हफ्ते में दो बार पानी दें। सेम को खाद भी देना चाहिए। 

सेम की खेती में कटाई ( Harvesting Beans in Cluster/Lima Beans Cultivation )

सेम की कटाई 60 से 70 दिन बाद की जाती है। जब फलियां हरी और मुलायम हों तो उन्हें तोड़ लें।

 

सेम की खेती करने वाले राज्य ( Cluster/Lima Beans Cultivating States )

भारत में इन राज्यों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में सेम की खेती खरीफ और रबी दोनों मौसमों में की जाती है। खरीफ मौसम में सेम की खेती जून से जुलाई तक की जाती है और रबी मौसम में अक्टूबर से नवंबर तक की जाती है।

सेम की खेती में लागत और कमाई ( Cost and Earning in Cluster/Lima Beans Cultivation )

प्राकृतिक तरीके से सेम की खेती करने में ज्यादा खर्च नहीं आता है। 1 एकड़ खेती में लगभग 10000 रूपये का खर्चा आता है जो कि काफी कम है। 1 एकड़ खेती में लगभग 15 क्विंटल सेम का उत्पादन होगा। बाजार में सेम लगभग 40 रुपये प्रति किलो होता है। 15 क्विंटल सेम से 80 हजार से 90 हजार रुपये की कमाई होती है। लागत हटाने के बाद प्रति एकड़ 70000 रूपये की कमाई होती है। इस हिसाब से एक बार सेम लगाने के बाद आप कम से काम हर हफ्ते सेम की तुड़ाई कर सकते हो। इसकी खेती लगभग 4 महीना होती है।

1. सेम की खेती कम लागत में की जा सकती है।
2. सेम की खेती में अच्छी पैदावार होती है।
3. सेम की अच्छी कीमत मिलती है।
4. सेम की खेती में सेम कम समय में तैयार होती है।
5. सेम की खेती में हर हफ्ते तुड़ाई की जा सकती है।
6. सेम की खेती में 4 महीने तक उत्पादन होता है।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How Can You Take Help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।
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अधिक जानकारी के लिए हमसे संपर्क करें +91 9335045599 ( शबला सेवा )

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