कुंदरू का उपयोग, फायदा एवं कुंदरू की खेती

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मौसमी फल और सब्जियां हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। कुंदरू भी एक मौसमी हरी सब्जी है। गर्मी का मौसम आते ही कुंदरू आसानी से उपलब्ध हो जाता है। कुंदरू ( Ivy Gourd / Little Gourd ) को तेंडली के नाम से भी जाना जाता है। यह कुकुरबिटेसी ( Cucurbitaceae ) के परिवार से संबंधित है। टेंडली एक बेल का पौधा है जो झाड़ियों, बाड़ और अन्य समर्थनों पर तेजी से फैल सकता है। कुंदरू का वैज्ञानिक नाम कोकिनिया इंडिका है। कुंदरू की त्वचा चिकनी होने के साथ-साथ हरे और सफेद रंग की होती है। युवावस्था में यह अनुदैर्ध्य धारियों वाला हरा होता है और पकने पर चमकदार लाल रंग में बदल जाता है।

कुंदरू में पाए जाने वाले पोषक तत्व ( Nutrients Found in Kundru / Ivy Gourd )

कुंदरू में विटामिन ( Vitamin ), पोटैशियम ( Potassium ), कैल्सियम ( Calcium ), आयरन ( Iron ) एवं फाइबर ( Fiber ) आदि पाए जाते हैं। कुंदरू में एंटी-ऑक्सीडेंट ( Anti-oxidant ), एंटी इंफ्लेमेट्री ( Anti-inflammatory ) एवं एंटी बैक्टीरियल ( Anti-bacterial ) गुण भी पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लाभदायक होते हैं।

कुंदरू के सेवन के स्वास्थ्यवर्धक फायदे ( Health Benefits of Consuming Kundru / Ivy Gourd )

कुंदरू की सब्जी का सेवन करने से पाचन क्रिया बेहतर होती है।

कुंदरू के सेवन से कैंसर होने से बचा जा सकता है।

मधुमेह के लिए कुंदरू का उपयोग किया जा सकता है।

कुंदरू के सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

गुर्दे की पथरी को दूर करने के लिए कुंदरू का उपयोग किया जा सकता है।

कुंदरू हृदय को स्वस्थ रखने का काम कर सकता है।

कुंदरू के सेवन से संक्रमण से बचा जा सकता है।

कुंदरू के सेवन से डिप्रेशन से बचा जा सकता है।

कुंदरू से वजन का अंदाजा लगाया जा सकता है।

कुंदरू थकान दूर करने का काम कर सकता है।

कुंदरू की खेती ( Cultivation of Kundru / Ivy Gourd )

कुंदरू की खेती हर जगह की जा सकती है। जिन क्षेत्रों में सर्दी कम पड़ती है, वहां कुंदरू की खेती से वर्ष भर उत्पादन मिलता है। वहीं, जहां ठंड अधिक होती है, वहां इस मौसम में उत्पादन कम होने के कारण फसल करीब 7-8 महीने ही मिल पाती है।  यदि इसकी खेती मचान बनाकर की जाए तो अधिक उत्पादन मिलता है।

कुंदरू की खेती में मिटटी, तापमान एवं जलवायु ( Soil, Temperature and Climate in Kundru / Ivy Gourd cultivation )

कुंदरू की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन जीवांश और जीवांश से भरपूर बलुई दोमट मिट्टी अधिक उपजाऊ मानी जाती है ताकि अच्छी फसल प्राप्त हो सके। मिट्टी का पीएच 7 से अधिक नहीं होना चाहिए। इसकी खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सर्वोत्तम होती है। 30 से 35 डिग्री तापमान के बीच इसकी पैदावार बहुत अच्छी होती है ।

कुंदरू की खेती में मिट्टी को तैयारी एवं बुवाई ( Soil Preparation and Sowing in Kundru / Ivy Gourd Cultivation )

कुंदरू को बहुवर्षीय लता वाली फसल के रूप में जाना जाता है जो एक बार बोने पर कई वर्षों तक उपज देती है। कुंदरू की खेती के लिए खेत को ठीक से तैयार करना जरूरी है, क्योंकि बारहमासी फसल होने के कारण एक बार लगाने पर पौधा 2 से 4 साल तक फल देता रहता है। मई से जून माह में गहरी जुताई कर खेत को खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे खरपतवार एवं कीट एवं बीमारियाँ नष्ट हो जाती हैं। जुलाई माह में 2 से 3 बार हैरो या कल्टीवेटर से जुताई कर खेत की जुताई करें, परंतु जल निकासी का उचित प्रबंधन आवश्यक है। कुंदरू को दो तरह से लगाया जा सकता है।

कुंदरू को बेल की कलम से कैसे लगाएं ( How to Plant Kundru from Vine Cuttings )

कुंदरू एक बेल वाला पौधा है। इसे बेल द्वारा रोपने के लिए 4 से 12 महीने पुरानी स्वस्थ कुंदरू की बेलों से 10-20 सेंटीमीटर लंबी, 1.5 सेंटीमीटर  मोटी 5-7 गांठदार तने की कलमों को जुलाई माह में 45 डिग्री के कोण पर काट लें। मिट्टी, कोकोपीट और अन्य उर्वरकों के मिश्रण को पॉलिथीन बैग में भरें और इन कलमों को लगभग 3 इंच की गहराई पर लगाएं। कुंदरू का पौधा 55 से 60 दिन में रोपण योग्य हो जाता है।

कुंदरू को बीज से कैसे लगाएं ( How to Plant Kundru from Seed )

कुंदरू को बीज से उगाने के लिए पॉलिथीन बैग में मिट्टी, कोकोपीट और अन्य उर्वरकों का मिश्रण भरें। कुंदरू के बीजों को ऊपर से 1-2 इंच की दूरी पर खाली पॉलिथीन बैग के बीच में लगभग 1 सेंटीमीटर की गहराई पर रोपें और मिट्टी से ढक दें। मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाये रखने के लिए स्प्रिंकलर से हल्की सिंचाई करें। कुंदरू के बीज को अंकुरित होने में लगभग 15  से 30 दिन का समय लगता है। अंकुरण के बाद 6 से 7 इंच का होने पर पौधे की रोपाई की जा सकती है।

कुंदरू की उन्नत किस्में ( Improved Varieties of Kundru / Ivy Gourd )

अपने क्षेत्र के अनुसार कुंदरू की उन्नत किस्म का चयन करें क्योंकि इसमें विविधता अधिक होती है।

इंदिरा कुंदरू 35 – इस किस्म के फल लंबे, हल्के हरे रंग के होते हैं और फल 6 सेंटीमीटर लंबा होता है। यह अधिक उपज देने वाली किस्म है। इस किस्म से प्रति बेल लगभग 22 किलोग्राम फल प्राप्त किया जा सकता है। इस किस्म की उत्पादन क्षमता  लगभग 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

इंदिरा कुंदरू 5 – इस कुंदरू किस्म के फल हल्के हरे, अण्डाकार होते हैं, फल की लंबाई लगभग 4.30 सेंटीमीटर होता है। यह अधिक उपज देने वाली किस्म है। इस किस्म से प्रति बेल लगभग 21 किलोग्राम फल प्राप्त किया जा सकता है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 425 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

काशी भरपूर (VRSIG-9) – कुंदरू की इस किस्म के फल आकर्षक हल्के हरे, अण्डाकार और हल्की सफेद धारियों वाले होते हैं। यह रोपण के लगभग 50 दिन बाद फल देना शुरू कर देता है। इस किस्म से प्रति पौधे लगभग 25 किलोग्राम फल प्राप्त किये जा सकते हैं. इसकी उत्पादन क्षमता 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

सुलभा (सीजी 23) – कुंदरू की इस किस्म के फल लंबे, 9.25 सेमी, गहरे हरे रंग के होते हैं। इसमें रोपण के लगभग 40 दिन बाद फूल आ जाते हैं और पहली तुड़ाई लगभग 50 दिन में हो जाती है। यह किस्म एक वर्ष में प्रति पौधा लगभग 1050 फल देती है। इसकी उपज क्षमता लगभग 425 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

कुंदरू की खेती में बीज की मात्रा और बीज का उपचार ( Seed Quantity and Seed Treatment in Kundru / Ivy Gourd Cultivation )

कलमों से तैयार कुंदरू के पौधों से पॉलिथीन हटा कर मिट्टी लगा कर रोपाई करें। रोपाई के समय 10 मादा पौधों के साथ 1 नर पौधा भी लगाएं ताकि परागण अच्छे से हो सके और फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त करें। कुंदरू के बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 5 से 27°C तापमान आवश्यक है।

कुंदरू की खेती में फसल की देखभाल ( Crop Care in Kundru / Ivy Gourd Cultivation )

कुंदरू की फसल में कीटों और बीमारियों का अधिक प्रकोप देखा गया है, जिनमें फल मक्खी, फली बीटल, चूर्णिल फफूंदी, एफिड्स, माइट, थ्रिप्स और सफेद मक्खी आदि शामिल हैं। इनकी रोकथाम के लिए माइक्रो झाइम के साथ गौमूत्र या नीम के काढ़े का मिश्रण बनाकर पौधों पर छिड़काव करें।

चूर्णिल फफूंदी ( Powdery Mildew )- यह रोग बरसात के मौसम में होता है। इसमें पुरानी पत्तियों की निचली सतह पर सफेद गोल धब्बे बन जाते हैं। जो बाद में आकार और संख्या में बढ़ कर पत्ती की दोनों सतहों पर आ जाते हैं। गंभीर संक्रमण के दौरान पत्तियाँ भूरे रंग की हो जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं।

कुंदरू की खेती में सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन ( Irrigation and Fertilizer Management in Kundru / Ivy Gourd Cultivation )

कलमों की रोपाई के तुरंत बाद पौधों की सिंचाई करें। ठंड के दिनों में अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती लेकिन गर्मी के मौसम में कुंदरू के पौधों की सिंचाई 6 से 7 दिन के अंतराल पर करें। नर्सरी और रोपाई से पहले खेतों को गहरी जुताई करके तैयार किया जाता है और उसमें कई टन गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट खाद मिला दी जाती है। बारिश के दौरान खेत से पानी की निकासी की उचित व्यवस्था करना आवश्यक है। यदि सिंचाई के लिए ड्रिप विधि का प्रयोग किया जाए तो फसल बेहतर होगी।

कुंदरू की खेती करने वाले राज्य ( Kundru / Ivy Gourd Cultivation States )

कुंदरू की फसल छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में किसान कुंदरू की खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं।

कुंदरू की खेती में लागत एवं कमाई ( Cost and Earning in Kundru / Ivy Gourd Cultivation )

कुंदरू की खेती में कुल लागत लगभग 3 लाख रूपये प्रति हेक्टेयर तक आती है। कुंदरू की खेती में प्रति हेक्टेयर खेती से आप लगभग 400 से 450 क्विंटल तक उत्पादन होता है। कुंदरू खुदरा बाजार में लगभग 100 रुपये प्रति किलो और थोक बाजार में लगभग 50 रुपये प्रति किलो बिकता है। इस तरह 400 रुपये क्विंटल की उपज को 50 रुपये की दर से बेचते हैं तो 20 लाख रुपये कमा सकते हैं।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How Can You Take Help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।

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