आडू का उपयोग, फायदा एवं आडू की खेती

आडू या सतालू  का फल सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। पीले और लाल रंग का यह फल आकार में काफी हद तक सेब जैसा लगता है। फल हमारे स्वास्थ्य को लगभग हर प्रकार से फायदा पहुंचाते हैं। कहा जाता है अगर रोजाना फलों का सेवन करते हैं तो एक नहीं बल्कि कई बीमारियों से बचा जा सकता है। वैसे तो बाज़ार में ऐसे कई फल है जिनका हमेशा सेवन करते रहना चाहिए। इन्हीं में से एक है आड़ू का फल, जो पोषक तत्वों से भरपूर होता है।

आडू / सतालू में पाये जाने वाले खनिज ( Minerals Found in Peaches )

आडू या सतालू में फाइबर, विटामिन ( Vitamin ), खनिज और पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाये जाते है जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते है।  इसके अंदर फाइबर ( Fiber ), एंटी-बैक्टीरियल ( Antibacterial ),  विटामिन A2, , विटामिन B, आयरन ( Iron ), विटामिन A, प्रोटीन ( Protein ), पोटेशियम ( Potassium ), सोडियम  Sodium ), जिंक ( zink ), कॉपर ( Copper ), सेलेनियम ( selenium ), विटामिन K,  मैग्नीशियम ( Magnesium ),कैल्शियम ( Calcium), आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

आडू / सतालू के स्वास्थ्यवर्धक फायदे ( Health Benefits Of Peaches )

  1. आडू इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करता है।
  2. आडू / सतालू आँखों के रेटिना को स्वस्थ रखने में बहुत मदद करता है।
  3. एनीमिया शरीर में आयरन की कमी के कारण होता है। ऐसे में आडू के अंदर पाया जाने वाला विटामिन C शरीर में आयरन के बेहतर अवशोषण में मदद करता है।
  4. आडू / सतालू वजन कम करने में मदद करता है। 
  5. आडू / सतालू का नियमित रूप से सेवन करने से पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे पेट दर्द, कब्ज, गैस, बवासीर, जैसी बीमारियों को दूर करने में मदद करता हैं।

आडू / सतालू की खेती ( Peach Cultivation )

सतालू या आडू की खेती शीतोष्ण जलवायु की प्रमुख फसल है| भारत में आडू की खेती मुख्यत: उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर की ऊँची घाटियों और उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा रही है| पर्वतीय क्षेत्रों में आडू की खेती बहुत पहले से की जा रही है, लेकिन वे पुराने बाग बीजू पौधों से लगाएं हुए है| जिससे बागवानों को उनसे अच्छी पैदावार प्राप्त नही होती है| लेकिन पर्वतीय क्षेत्र की घाटियों में इसका अच्छा उत्पादन होता है तथा हाल के वर्षो में दिये गये महत्व से आडू की फसल के क्षेत्रफल और उत्पादन की क्षमता में भी वृद्धि हुई है| अब तो पर्वतीय क्षेत्र की घाटियों से इस फल का निर्यात भी विदेशों में किया जा रहा है जिससे किसानों को अच्छी आमदनी भी हो रही है| बागान बन्धुओं को आडू की खेती वैज्ञानिक तकनीक से करनी चाहिए| ताकि उनको इसकी फसल से अधिकतम और गुणवत्तायुक्त उत्पादन प्राप्त हो सके|

1. आडू / सतालू की खेती के लिए आवश्यक जलवायु, मिट्टी और तापमान ( Climate, Soil and Temperature required for Peach Cultivation )

समशीतोष्ण और समशीतोष्ण जलवायु इसकी खेती के लिए सफल है। लेकिन वे क्षेत्र जहां देर से (वसंत) मौसम में पाला पड़ता है। इसके लिए उपयुक्त नहीं माना। आड़ू या सतालु की खेती मध्य पर्वतीय क्षेत्र, घाटी और तराई और भावर क्षेत्रों में की जाती है। इसके सफल उत्पादन के लिए हल्की दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का पी एच मान 5.5 – 6.2 की सीमा में होना चाहिए, साथ ही बहुत सारे कीटाणुओं का होना जरूरी है। जिस भूमि में इसकी खेती की जा रही है, वहां जल निकासी की उचित व्यवस्था होना बहुत जरूरी है, अन्यथा पौधा जड़ सड़न से ग्रस्त हो जाता है।

2. आडू / सतालू बोने का सही समय और तरीका ( The Right Time and Method of Planting Peaches )

इसके बीज रबी की फसल के साथ बोए जाते हैं, सिंचित और असिंचित स्थानों में बीज बोने का समय अलग-अलग होता है। सिंचित स्थानों में बीज बोने के लिए अक्टूबर से दिसंबर के बीच का महीना सबसे उपयुक्त होता है और असिंचित स्थानों में बीजों की रोपाई सितंबर से अक्टूबर के बीच की जाती है। बीजों की बुवाई मशीन से की जाती है, जिसके लिए खेत में कतारें तैयार की जाती हैं और प्रत्येक कतार के बीच एक से डेढ़ फीट की दूरी रखी जाती है। इन बीजों को कतारों में 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी पर 5 से 7 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना होता है।

3. आडू / सतालू की खेती के लिए खेत की तैयारी ( Field Preparation for Peach Cultivation )

सतालू या आडू बोने से पहले इसके खेत को अच्छे से तैयार कर लिया जाता है, इसके लिए सबसे पहले खेत की गहरी जुताई की जाती है। जुताई के बाद खेत को कुछ देर के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दें। इससे खेत की मिट्टी को अच्छी धूप मिलती है और मिट्टी में मौजूद हानिकारक तत्व पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। खेत की पहली जुताई के बाद प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद देनी होती है। खाद को खेत में डालने के बाद गोता लगाकर खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिला दिया जाता है। इसके बाद खेत में पानी लगाकर जुताई की जाती है, जुताई के बाद जब खेत की मिट्टी सूखी दिखाई देने लगे, उस समय खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कल्टीवेटर से की जाती है। 

4. आड़ू / सतालू की उन्नत किस्में ( Improved Varieties of Peaches )

एलटन, वर्ल्डस अलएस्ट, अर्ली व्हाइट जाएन्ट, रैड हैवन, स्टार्क रैड गोल्ड, स्नोक्वीन, एलबर्टा, एलेक्जेन्डर, शरबती, शान ए पंजाब , समरसैट, शर्बती, सहारनपुर, सन रेड, फ्लोरडासन, सहारनपुर प्रभात

5. सतालू / आडू के पौधों की सिंचाई ( Irrigation of Peach Plants )

असिंचित क्षेत्रों में चने की 70 से 75 प्रतिशत बुवाई की जाती है। जिस वजह से इसके पौधों को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है. जबकि सिंचित स्थानों पर पौधों को पानी देना पड़ता है। इसके पौधों को अधिकतम तीन से चार सिंचाई की आवश्यकता होती है, इसकी पहली सिंचाई बीज बोने के 30 से 35 दिनों के बाद की जाती है, और बाद की सिंचाई 25 से 30 दिनों के अंतराल पर करनी होती है। 

सतालू / आडू की खेती करने वाले राज्य ( Peach Farming States )

भारत में मुख्यत: उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर की ऊँची घाटियों एवं उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में इसका सफलतापूर्वक उत्पादन किया जाता है। देश में इसकी खेती लगभग 21605 हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जा रही है जिससे लगभग 47426 मैट्रिक टन उत्पादन होता है। उत्तरांचल, आडू उत्पादन में अग्रणी प्रदेश है। प्रदेश में 13166 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आडू की खेती की जा रही है जिससे लगभग 31715 मैट्रिक टन उत्पादन होता है। उत्पादकता 2.4 टन प्रति हेक्टेयर है।

सतालू / आडू की खेती में लागत और कमाई ( Cost and Earnings in Peach Cultivation )

आड़ू / सतालू उद्यान स्थापित करने में, खेत की तैयारी, पौधे रोपना, गड्ढे खोदना, बगीचे में खाद एवं उर्वरकों, कीट/कवकनाशी रसायनों और अन्य कर्षण गतिविधियों का उपयोग, बगीचे की स्थापना से लेकर फल लगने तक ( चार वर्ष तक ) लागत लगभग रु. 40,000/- प्रति हेक्टेयर खर्च होता है। आड़ू उद्यान में प्रति एकड़ आड़ू बेचने से उन्हें लगभग एक लाख रुपए तक कमाई होती है।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How can you take help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।
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