खेती ही बचाएगी भारतीय अर्थव्यवस्था को

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लॉकडाउन के कारण देश भर में अपने-अपने घरों में बंद लोगों के लिए एक ही सबसे बड़ी जरूरत है। वह है भोजन की, और वह भी एक बार नहीं, बल्कि तीन बार। चाहे अमीर आदमी हो, जो अपने घर में आराम से बैठा हुआ रोज अलग-अलग व्यंजन बनाने के तरीके निकालता है, या गरीब आदमी हो, जो यमुना किनारे फेंके गए सड़े केले के ढेर से खाने लायक केला निकालता है, भोजन मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता है। लॉकडाउन के इस कठिन समय में बार-बार दोहराई जाने वाली यह कहावत-कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है-न केवल और स्पष्ट है, बल्कि इसका महत्व और प्रतिपादित हुआ है।

लेकिन जरा इसकी कल्पना करें कि इस चुनौतीपूर्ण समय में अगर देश के पास पर्याप्त अनाज न हो, तो कैसी उथल-पुथल मच जाएगी। इसकी कल्पना करें कि अगर हमने मुख्यधारा के आर्थिक विशेषज्ञों की सलाह मानते हुए हमारी आबादी के 20 फीसदी लोगों के बराबर अनाज का भंडार रखा होता, तो क्या हालत होती। कल्पना करें कि अगर एपीएमसी मंडी को भंग कर दिया गया होता और अनाज की सरकारी खरीद का सिलसिला खत्म कर दिया जाता, तो क्या हालत होती। एक अध्ययन बताता है कि हमारी राष्ट्रीय जरूरत के तीन गुने से भी अधिक अनाज का भंडार होने के बावजूद 96 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों को राशन नहीं मिला है। लॉकडाउन के बाद असंख्य भूखे-प्यासे मजदूर सैकड़ों-हजारों किलोमीटर का पैदल सफर कर जिस तरह अपने गांव पहुंचे, वह दशकों से घनीभूत हो रहे संकट का साकार दृश्य था। संकट के समय मजदूरों ने शहरों से जिस तरह गांवों का रुख किया, और रास्ते में फंसे लोगों के लिए राज्य सरकारों ने जिस तरह भोजन और शिविरों का प्रबंध किया, वह कृषि संकट से जुड़े एक मौजूदा, लेकिन छिपे हुए पहलू की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।

दरअसल शहरों ने गांवों से आए मजदूरों को स्वीकारने से इनकार किया, और स्पष्टतः एक विभाजक रेखा बनाए रखी। ऐसी स्थिति में, लॉकडाउन के कारण जब रोज मजदूरी मिलने की शृंखला टूटी, तब मजदूरों ने खुद को अलग-थलग पाया। गांव लौट चुके मजदूरों की बड़ी संख्या अभी रोजगार के लिए शहर नहीं लौटने वाली। उन्होंने कठिन समय में गांव लौटने का फैसला इसलिए लिया कि अपने परिजनों के बीच वे अंततः भूखे नहीं रहेंगे। यह तथ्य हमारी असंगत आर्थिक सोच के बारे में ही बताता है।

जाहिर है, बड़ी संख्या में लोगों को गांवों से निकालकर शहरों में ले जाया गया, क्योंकि शहरों को सस्ते मजदूर चाहिए। एक तरफ कृषि उत्पादों की कीमत कम रखकर खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखकर, दूसरी ओर, उद्योगों को सस्ता कच्चा माल मुहैया कराकर कृषि क्षेत्र को जान-बूझकर कमतर हैसियत दी गई। किसानों को उनके अनाज के उचित मूल्य से वंचित करने के बावजूद किसान साल दर साल रिकॉर्ड अनाज उत्पादन कर रहे हैं। यह संयोग नहीं है कि लॉकडाउन उसी समय हुआ, जब रबी फसल की कटाई का समय है। इस साल बेमौसमी बारिश के बावजूद फसल अधिक होने की उम्मीद थी।

लेकिन चूंकि लोग घरों में बंद हैं, और रेस्टोरेंट, होटल और ढाबे बंद हैं, ऐसे में, जल्दी बर्बाद हो जाने वाली सब्जियों और फलों की मांग ही नहीं रही। बंदगोभी,फूलगोभी, मूली, मटर और दूसरी सब्जियों से भरे खेतों में किसानों द्वारा दोबारा हल चलाने की रिपोर्टें आई हैं। किसानों ने टमाटर अपने खेतों में ही डंप कर दिए। स्ट्रॉबरी गायों को खिला दी गई और मशरूम सड़ गए। अलफांसो आम,अंगूर, केले, कॉफी, चाय, काजू और मसाले की कीमत लुढ़क गई। पोल्ट्री उत्पादकों की बर्बादी तो सबसे अधिक हुई। दूध, मछली और फूल के बाजारों पर भी काफी असर पड़ा। कृषि मजदूरों की कमी ने मौजूदा संकट को और गहरा दिया है। गेहूं का उत्पादन इस बार रिकॉर्ड 10.6 करोड़ टन हुआ बताया जाता है, पर खेत मजदूरों के अभाव से गेहूं की कटाई प्रभावित होगी।

हालांकि सरकार ने व्यावहारिक कारणों से कृषि, बागवानी, बागानी फसलों, मछली पालन और पशुपालन को आज से लॉकडाउन से बाहर रखा है, और गेहूं की खरीद भी सुस्त रफ्तार से होने लगी है। लेकिन लॉकडाउन के पहले दौर में कृषि क्षेत्र के बुरी तरह प्रभावित होने के बावजूद ऐसा जताया जा रहा है कि तुलनात्मक रूप से कृषि क्षेत्र की स्थिति बेहतर है। इस संकट को छोड़ भी दें, तो बड़ा सवाल यह है कि क्या यह महामारी कृषि क्षेत्र के बारे में हमारा नजरिया बदल देगी।

क्या इसके बाद सरकारी नीति में कृषि को वरीयता मिलेगी? या संकट से बाहर निकल जाने के बाद कृषि के प्रति पहले जैसा ही उपेक्षित नजरिया रहेगा? यह तो तय है कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारों का जोर बढ़ेगा, पर क्या कृषि को भी उतना ही महत्व मिलेगा? कृषि के प्रति नीति-नियंताओं की सोच बदलने से क्या खेती-किसानी आर्थिक रूप से फायदेमंद हो जाएगी? इन सवालों पर गंभीरता से विचार-विमर्श होना चाहिए, क्योंकि कोविड-19 के बाद नीतियों में बदलाव कृषि क्षेत्र का भविष्य तय करेगा। पिछले कई दशकों से नीति निर्माण में खेती को उपेक्षित किया गया है।

जो कृषि क्षेत्र 50 फीसदी आबादी को रोजगार देता है, उसमें 2011-12 से 2017-18 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश जीडीपी का 0.3 से 0.4 फीसदी रहा। चूंकि संकट के इस समय में कृषि अर्थव्यवस्था के मजबूत खंभे के रूप में सामने आ रही है, ऐसे में, कृषि को हाशिये पर डालने का प्रयास राजनीतिक रूप से आत्मघाती होगा। कृषि क्षेत्र में जहां व्यापक बदलाव और भारी निवेश की जरूरत है, वहीं किसानों को उनके उपज का लाभकारी मूल्य और मासिक आय मुहैया कराना चुनौती होगा।

ओईसीडी (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) का एक अध्ययन बताता है कि अपने फसलों का उचित मूल्य न पाने से भारतीय किसानों ने 2000 से 2016-17 के बीच 45 लाख करोड़ रुपये खोए। अगर किसानों को ये रुपये मिलते, जो 2.6 लाख करोड़ सालाना बैठता है, तो खेती छोड़ लोग शहरों की ओर पलायन न करते। कोविड-19 के बाद सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। यह एक आशावादी सोच भर नहीं है। यह एक ऐसा विचार है, जिसका समय आ चुका है। (लेखक कृषि नीति विशेषज्ञ हैं।)

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