किसान की हथेली का दर्द

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हम सभी किसी न किसी एक पीढ़ी में गांव में पैदा हुए, यहीं पाले बड़े और फिर शिक्षा के लिए, रोजगार की तलाश में या शहर की चकाचौध में बड़े महानगरों और शहरों में जा कर बस गए।किसी के बाबा किसान थे, तो किसी के नाना किसान थे या किसी के पिता किसान है।

कोई अछूता नहीं है खेती-किसानी से, लेकिन किसी की एक पीढ़ी शहर में रह लें, तो इन्हें गांव के लोग इंसान नहीं लगते है।जब भी ये लोग या इनके बच्चें शहर से आते है तो बड़े बाबू जी हो जाते है।ये सब भूल जाते है कि हम इसी गांव की मिट्टी और खेती-किसानी से होकर ही शहर की यात्रा तय कर पाए है।

गांव से ही न जाने कितने नेता, अभिनेता, अधिकारी और देश के मुखिया निकलें पर गांव और किसान की सुध लेने गांव कोई नहीं आना चाहता है।आखिर क्यों? नई पीढ़ी किसानों को अपना रोल मॉडल नहीं बनाना चाहती है।गांव से ही निकल कर न जाने कितने ही लोगों की किस्मत बदल गई, लेकिन न किस्मत गांव की बदली और नहि किसान की पीड़ा कम हुई।जो किसान अनाज उगा कर सारे जगत का पेट भरता है, क्या हमनें कभी उसकी हथेली देखी है?

अगर नहीं देखी है तो कभी जाओ अपने गांव और देखों अपने दादा, नाना, पिता, चाचा, भाई की हथेली और गांव में उनसे पूछो कितना संघर्ष करते है सबका पेट पालने के लिए।काश! कभी कोई इनकी खुरदुरी हथेली पर भी हाथ रख कर इनके मन के दर्द को भी समझता और बांटता, जिससे किसानों को भी उम्मीदों की नई किरण दिखाई दें।

किसानों की खेती-किसानी में अधिक जोखिम व कम आय होने के कारण, आज की नईपीढ़ी खेती-बाड़ी से दूर होती जा रही है। अब गांव में किसी का बेटा अगर पढ़-लिख कर शहर चला गया, तो वह गांव केवल घूमने आता है और गांव में लोगों का मुफ्त में सलाह भी देता है कि गांव में क्या रखा है शहर जाओ।आपको आज भी ऐसी नई पढ़ी-लिखी पीढ़ी शहर में मिल जाएगी, जिसे यह नहीं पता होगा की आटा, चावल, बेशन कैसे बनता है।

जितनी तेजी से शहर आबाद हुए, लोगों ने किसान और गांव को उतनी ही तेजी से भुला दिया।बाबू जी लोगों के लिए गांव पिकनिक स्पॉट बनकर ही रह गए और इनकी नजरों में किसान केवल एक गरीब, बेबस, कष्ट झेलने वाला व्यक्ति ही बनकर रह गया है।अक्सर बेमौसम बारिश की बूंदें व ओले मानों उनकी किस्मत पर बरस जाते है।किसी की भी जिंदगी में दर्द छोटा हो या बड़ा, हंसती-खेलती जिंदगी में खलल जरूर डाल देता है और किसान तो हमेशा से दर्द झेलता आया है, किसान तो हमेशा से इस जगत का अन्नदाता रहा है।

अभी भी समय है किसानों की पीड़ा को समझकर उनके उत्पादों का सही मूल्य देकर, कृषक और गांवों को सशक्त बना सकते है और किसानों की मुसीबतों को कम कर सकते है।भारतीय किसान के जीवन में एक धर्म है, हम कह सकते हैं कि किसान ईश्वर की जटिल उपस्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं।किसानों की दुखदाई हथेली पर हाथ रखकर, इनका आभार व्यक्त करों कि इनकी बदौलत हम अन्न खाते है और जिन्दा रहते हैं।

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आशीष कुमार

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