ककोड़ा का उपयोग, फायदा एवं ककोड़ा की खेती

ककोड़ा एक लोकप्रिय पौष्टिक सब्जी होती है। इसकी खेती पूरे भारत में प्राचीन समय से की जाती रही है। ककोड़ा को ककोरा, कंटोला, वन करेला, मीठा करेला, खेखसा, अगाकारा, केकरोल, कोरोला, करटोली और परोड़ा आदि कई नामों से जाना जाता है। यह सब्जी करेला प्रजाति की है, लेकिन ये करेले जैसी कड़वी नहीं होती है। ककोरा एक बेल में फलने वाला फल है। इसका रंग हरा होता है। जब यह पकता है तो यह हल्‍का पीला हो जाता है। ककोरा की बाहरी सतह को छीलकर इनसे कई प्रकार के व्‍यंजन बना सकते हैं, जो स्‍वादिष्‍ट होने के साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य के लिए फायदेमंद होते हैं।

ककोड़ा में पाए जाने वाले पोषक तत्व ( Nutrients Found in Spiny Gourd / Kakoda )

ककोरा में पाए जाने वाले पोषक तत्व कई स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक करने की क्षमता रखते हैं। ककोरा ( कंटोला ) में कार्बोहाइड्रेट ( Carbohydrate ), प्रोटीन ( Protein ), वसा ( Fat ), फाइबर ( Fiber ) के साथ कई खनिज ( Minerals ) पाए जाते हैं। इनके अलावा ककोरा में एस्कॉर्बिक एसिड ( Ascorbic Acid ), कैरोटीन ( Carotene ), थियामिन ( Thiamin ), राइबोफ्लेविन ( Riboflavin ) और नियासिन ( Niacin ) जैसे आवश्यक विटामिन ( Vitamins ) थोड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं। इन सभी पोषक तत्वों की मौजूदगी की वजह से हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है।

ककोड़ा के सेवन से स्वास्थ्यवर्धक फायदे ( Health Benefits of Consuming Spiny Gourd / Kakoda )

  1. ककोड़ा खाने से सिर दर्द, बाल झड़ना, कान दर्द, खांसी, पेट में संक्रमण नहीं होता है।
  2. ककोड़ा खाने से बवासीर और पीलिया जैसी बीमारियाँ भी दूर हो जाती हैं।
  3. ककोड़ा खाने से डायबिटीज में भी काफी फायदा मिलता है। इससे ब्लड शुगर लेवल नियंत्रण में रहता है।
  4. ककोड़ा में विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो आंखों की रोशनी को तेज करने में मदद करता है।
  5. ककोड़ा की सब्जी में मौजूद रस का उपयोग पिंपल्स ( Pimples ) और एक्जिमा ( Eczema ) को ठीक करने के लिए किया जाता है।
  6. विटामिन C और एंटीऑक्‍सीडेंट की अच्‍छी मात्रा होने के कारण यह फ्री रेडिकल्‍स को नष्‍ट करने में मदद करता है और कैंसर की संभावनाओं को रोकता है।
  7. ककोड़ा की सब्जी बारिश में होने वाले त्वचा रोगों में लाभकारी होती है।

ककोड़ा की खेती ( Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

किसान धीरे-धीरे पारंपरिक फसलों की खेती के स्थान पर नई-नई तरह की मुनाफा देने वाली फसलों की ओर ध्यान दे रहे हैं क्योंकि देश में हर क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार कई मुनाफा देने वाली फसलें मौजूद है। हमारे देश के जंगलों में कुछ ऐसी जंगली फसलों की प्रजातियां भी पाई जाती है जिनकी खेती यदि किसान तकनीकी सूझबूझ और सही तरीके से करे, तो कम लागत में कई सालों तक अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। ऐसी ही एक जंगली फसल की प्रजाति ककोड़ा है। ककोड़ा में कई औषधीय गुण हैं। ककोड़ा की खेती ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में दो बार की जा सकती है। गर्मियों में ककोड़ा का अच्छा उत्पादन किया जा सकता है। इसकी बुआई ग्रीष्म ऋतु में जनवरी से फरवरी तक की जा सकती है। इसकी बुआई मानसून में जुलाई माह में की जाती है। कुछ विशेष प्रकार के जंगली इलाको में यह अपने आप भी उग जाता है। ककोड़ा के पौधे से तक़रीबन 10 वर्षो तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

ककोड़ा की खेती के लिए मिटटी, तापमान एवं जलवायु ( Soil, Temperature and Climate for Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा की खेती में अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अच्छे जल निकास वाली तथा उपजाऊ मिट्टी का उपयोग करना चाहिए। ककोड़ा के पौधों को आप अच्छी उपजाऊ बलुई दोमट मिट्टी में लगा सकते हैं और मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 7.0 के बीच गमले या बगीचे में कंटोला के पौधों के लिए आदर्श होता है। ककोड़ा की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान आवश्यक होता है। 

ककोड़ा की खेती में खेत की तैयारी ( Preparation of Field in Spiny Gourd / Kakoda cultivation )

सबसे पहले खेत की जुताई करने से खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। फिर खेत में पानी छोड़ दें। जब पानी सूख जाए तो दो से तीन तिरछी जुताई करके खेत की मिट्टी को भुरभुरा बना लें। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है | समतल खेत में पौध रोपाई के लिए गड्डे तैयार किये जाते है|

ककोड़ा की खेती में बुवाई कब और कैसे करें ( When and How to Sow in Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा की बुवाई जनवरी से फरवरी माह के बीच में की जा सकती है जिससे इसकी बेल में गर्मी तक ककोड़ा के फल लगने लगते हैं। वर्षा ऋतु में इसकी बुवाई जुलाई के अंत तक की जा सकती है जिससे यह बरसात के मौसम में फल देने लगती है। ककोड़ा की बुवाई साल में दो बार की जा सकती है। इस फसल की बुवाई अच्छी प्रकार तैयार खेत में गड्ढे तैयार किये जाते हैं, ये गड्ढे 2 से 3 मीटर की दूरी पर कतारों में बनाये जाते हैं। पंक्तियों के बीच 4 मीटर की दूरी रखें तथा प्रत्येक पंक्ति में 10 गड्ढे बनायें जिसमें लगभग 8 गड्ढों में मादा पौधे और बाकी गड्ढों में नर पौधे लगाए जाते हैं। पौधों की रोपाई के बाद उन्हें चारों तरफ से अच्छी तरह मिट्टी से ढक दें। ककोड़ा की खेती के लिए नर्सरी विधि का भी उपयोग किया जा सकता है।

ककोड़ा की उन्नत किस्में ( Improved Varieties of Spiny Gourd / Kakoda )

ककोड़ा की किस्मों में इंदिरा कंकोड-1, अम्बिका-12-1, अम्बिका-12-2, अम्बिका-12-3, इंदिरा कंकोडा ( आरएमएफ 37 ) और अर्का भारत आदि शामिल हैं। यह किस्म कीट-पतंगों से अपना बचाव करने में सक्षम है। इन प्रजातियों में कम से कम 70 से 80 प्रतिशत अंकुरण क्षमता होती है।

ककोड़ा की खेती में बीज की मात्रा एवं उपचार ( Seed Quantity and Treatment in Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा की खेती के लिए ककोड़ा की उन्नत किस्मों के लगभग ५ से १० किलो बीज प्रति हेक्टेयर  आवश्यक हैं। इसके बीज के उपचार की २ विधियां है जिनमे से जैविक विधि में बीज को मिटटी में डालने के पहले उसको गोबर में लपेट देते हैं। दूसरी विधि में रासायन उपयोग किये जाते हैं जिसकी जानकारी आपको आपके छेत्र के कृषि विशेषज्ञ से मिलेगी।

ककोड़ा की खेती में फसल की देखभाल ( Crop Care in Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा की अच्छी पैदावार के लिए खेत तैयार करने से पहले खेत में प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट मिलाकर मिट्टी पलटने वाले हल से 2 से 3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए। बाकी कोई भी देखभाल जरुरी नहीं है। ककोड़ा की फसल में खरपतवार नियंत्रण की अधिक जरूरत नहीं होती है | इसकी फसल में केवल दो से तीन गुड़ाई की जरूरत होती है |

ककोड़ा की खेती में सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन ( Irrigation and Fertilizer Management in Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद की जाती है। बरसात के मौसम में जरूरत पड़ने पर ही पानी दें तथा खेत में अधिक पानी होने पर हटा दें। जलभराव से खेत की फसल को अधिक नुकसान होता है।

ककोड़ा की खेती से अधिक उत्पादन लेने के लिए प्राकृतिक खाद के साथ-साथ उचित मात्रा में रासायनिक खाद देना भी जरूरी है। इसके लिए खेत की पहली जुताई के बाद प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिलाना होता है।

ककोड़ा की खेती में फसल की कटाई का समय ( Harvesting Time in Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा की फसल व्यावसायिक प्रयोजन एवं गुणवत्ता के अनुसार काटी जाती है। ककोड़ा की पहली तुड़ाई रोपण के बाद दो महीने बाद की जा सकती है। इस प्रकार साल में २ बार बुवाई होने के कारण ककोड़ा की पहली फसल अप्रैल और अगस्त में मिलती है। इस दौरान आपको ताज़ी स्वस्थ और छोटे आकार की ककोड़े की फसल मिलती है। इसके अलावा फसल की कटाई एक साल बाद भी की जा सकती है, इस दौरान फसल की गुणवत्ता काफी अच्छी पाई जाती है।

ककोड़ा की खेती करने वाले उत्पादक राज्य ( Spiny Gourd / Kakoda Cultivation Producing States )

वैसे तो इसकी खेती ठन्डे प्रदेशों को छोड़कर सभी प्रदेशों में की जाती है लेकिन लगभग वर्तमान में भारत में इसकी खेती उत्तर पूर्वी राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल,  उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में की जाती है। उत्तर पूर्वी राज्यों में असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैण्ड, और सिक्किम शामिल हैं।

ककोड़ा की खेती में खेती में लागत और कमाई ( Cultivation Cost and Earning in Spiny Gourd / Kakoda Cultivation )

ककोड़ा का सीजन आते ही ककोड़ा शुरू से ही 100 से 150 रुपये प्रति किलो की दर से बिकने लगता है जो लोग खेती भी नहीं करते, वे बीहड़ इलाकों में लगे ककोड़े बेचकर अपनी जीविका चलाते हैं। अगर पारंपरिक खेती की बात करें तो अगर फसल की लागत एक लाख रुपये हटा भी दी जाए तो वह इसकी खेती से करीब 4 लाख रुपये आसानी से कमा लेंगे। एक पौधे से 10 किलो तक पैदावार आसानी से मिल सकती है, इसलिए एक एकड़ में 500 पौधों के हिसाब से लगभग 5 लाख रुपये की कमाई की जा सकती है।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How Can You Take Help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।
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