कपूर कचरी का उपयोग, फायदा एवं कपूर कचरी की खेती

कपूर कचरी (Kapoor Kachri), जिसे एकांगी, जिंजर लिली, कपूर कचारी के नाम से भी जाना जाता है, भारत, नेपाल और भूटान की मूल निवासी एक बारहमासी जड़ी बूटी है। यह अदरक परिवार का सदस्य है और इसमें लंबे, नुकीले पत्ते और सफेद, सुगंधित फूल होते हैं। इसका प्रकंद चिकना, हल्के पीले रंग का होता है और इसमें हल्की सुगंध होती है। कपूर कचरी का वैज्ञानिक नाम हेडीचियम स्पिकैटम (Hedychium Spicatum) है।

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) को सितरूटी, गंधपलाशी, कपूर काचरी, शटी, षड्ग्रन्था, सुव्रता, गन्धमूलिका, गन्धारिका, गन्धवधू, वधू और पृथुपलाशिका आदि नामों से भी जाना जाता है।

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) का प्रकंद, या भूमिगत तना, पारंपरिक चिकित्सा में सदियों से उपयोग किया जाता रहा है। कपूर कचरी का उपयोग पारंपरिक आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा में भी किया जाता रहा है। कपूर कचरी एक प्राकृतिक और प्रभावी जड़ी बूटी है जो कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है।

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) को कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका हल्का कड़वा स्वाद और मिट्टी जैसी गंध होती है। इसे ताजा, सुखाकर या पाउडर बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। कपूर कचरी की चाय बनाकर पीने से कई स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं। कपूर कचरी का पाउडर कैप्सूल के रूप में भी लिया जा सकता है। कपूर कचरी से तेल और क्रीम भी बनाया जाता है।

कपूर कचरी में पाए जाने वाले पोषक तत्व ( Nutrients Found in Kapoor Kachri )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) एक स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जी है जो कई पोषक तत्वों से भरपूर होती है। कपूर कचरी में विटामिन (Vitamin) C, पोटेशियम (Potassium), मैग्नीशियम (Magnesium), आयरन (Iron), फाइबर (Fiber)  होते हैं। कपूर कचरी में एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidants) भी होते हैं। कपूर कचरी में एंटी-इंफ्लेमेटरी (Anti-Inflammatory) गुण होते हैं।

कपूर कचरी के सेवन से होने वाले फायदे ( Benefits of Consuming Kapoor Kachri )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) एक बहुमुखी जड़ी बूटी है जो कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है। यह विभिन्न प्रकार की बीमारियों और स्थितियों के इलाज में उपयोगी है।

  1. कपूर कचरी पाचन क्रिया को उत्तेजित करता है और अपच, गैस, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत देता है।
  2. यह जड़ी बूटी खांसी, सर्दी, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी सांस लेने की समस्याओं से राहत देने में मदद करती है।
  3. कपूर कचरी में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो गठिया, संधिशोथ, मांसपेशियों में दर्द और सूजन को कम करने में मदद करते हैं।
  4. यह जड़ी बूटी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती है और शरीर को संक्रमण से लड़ने में मदद करती है।
  5. कपूर कचरी त्वचा और बालों के लिए भी फायदेमंद है। यह त्वचा को पोषण देता है, मुंहासे और दाग-धब्बों को कम करता है और बालों को मजबूत और चमकदार बनाता है।
  6. कपूर कचरी से बनी क्रीम या तेल का उपयोग दर्द और सूजन को कम करने के लिए किया जा सकता है।
  7. इसका उपयोग संधिशोथ और सांस लेने की समस्याओं जैसी विभिन्न स्थितियों के लिए किया जाता है।

कपूर कचरी की खेती ( Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) अदरक परिवार का एक पौधा है। यह भारत, नेपाल और भूटान का मूल निवासी है। कपूर कचरी की खेती करना अपेक्षाकृत आसान है। यह एक छाया-सहिष्णु पौधा है जो विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उग सकता है। कपूर कचरी को बीज या प्रकंदों से उगाया जा सकता है। नेपाल, भूटान, और श्रीलंका में भी कपूर कचरी की खेती की जाती है।

अगर आप कपूर कचरी (Kapoor Kachri), की खेती की शुरुआत करना चाहते हैं, तो आप शबला सेवा संस्थान से संपर्क कर सकते हैं। संस्थान आपको कपूर कचरी की खेती की पूरी जानकारी और उचित मूल्य पर बीज प्रदान करेगा। आप इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं: +91-9335045599, 9430502802।

कपूर कचरी की खेती में जलवायु और मिटटी ( Climate and Soil in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) एक ठंडी जलवायु वाला पौधा है। यह 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से बढ़ता है। इसे 10 से 25 डिग्री सेल्सियस के तापमान की आवश्यकता होती है।

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) को अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में उगाया जाना चाहिए। मिट्टी का पीएच 6.5 से 7.5 होना चाहिए। मिट्टी को जैविक पदार्थों से भरपूर होना चाहिए। खेत को अच्छी तरह से तैयार किया जाना चाहिए और उसमें से सभी खरपतवारों को हटा दिया जाना चाहिए।

कपूर कचरी की खेती में खेत की तैयारी ( Field Preparation in Kapoor Kachri Cultivation )

खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें। सभी खरपतवार हटा दें. खेत में प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट डालें. खेत को समतल करें. क्यारियां 1 मीटर चौड़ी और 15 से 20 सेमी ऊंची बनाएं। क्यारियों के बीच 40 से 50 सेमी की दूरी रखें।

कपूर कचरी की खेती में बीज तैयार करना ( Preparation of Seeds in Kapoor Kachri Cultivation )

स्वस्थ और उचित आकार के बीजों का चयन करें। बीजों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगो दें। भिगोने के बाद, बीजों को थोड़ी देर के लिए हवा में सूखने दें।

कपूर कचरी की खेती में बीज से बुवाई ( Sowing from Seeds in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) बीजों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगो दें। एक नर्सरी बेड तैयार करें जो ढीला और अच्छी तरह से सूखा हो। बीजों को 1 सेंटीमीटर की गहराई पर बोएं। बीजों को मिट्टी से ढक दें और हल्के से पानी दें। बीजों को अंकुरित होने में 2 से 3 सप्ताह लगेंगे। बीजों को अंकुरित होने तक नम रखें।

बीज से कपूर कचरी की खेती के फायदे ( Benefits of Cultivating Kapoor Kachri from Seeds )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) की खेती एक कम खर्चीली खेती है। बीजों से उगाए गए पौधे अधिक रोग प्रतिरोधी होते हैं। बीजों से उगाए गए पौधों की उम्र अधिक होती है।

कपूर कचरी की खेती में प्रकंदों से बुवाई ( Sowing from Rhizomes in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) के स्वस्थ प्रकंदों का चयन करें जिनमें कम से कम दो अंकुर हों। प्रकंदों को 10 से 15 सेंटीमीटर के टुकड़ों में काट लें। एक क्यारी तैयार करें जो ढीली और अच्छी तरह से सूखा हो। प्रकंदों को 10 सेंटीमीटर की गहराई और 30 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपें। प्रकंदों को मिट्टी से ढक दें और हल्के से पानी दें। प्रकंदों को अंकुरित होने में 4 से 6 सप्ताह लगेंगे।

कपूर कचरी की खेती में नर्सरी बेड तैयार करना ( Preparing Nursery Beds for Kapoor Kachri Cultivation )

ढीली और अच्छी तरह से सूखा मिट्टी वाला नर्सरी बेड तैयार करें। बेड में अच्छी मात्रा में जैविक खाद मिलाएं। बेड को समतल कर हल्का पानी दें। नर्सरी में 1 मीटर चौड़ा और 15 से 20 सेमी ऊंचा बेड बनाएं। बेड के बीच 40 से 50 सेमी की दूरी रखें।

कपूर कचरी की खेती में अंकुरण और रोपाई ( Germination and Planting in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) के बीजों को अंकुरित होने में 2-3 सप्ताह लगेंगे। अंकुरित होने के बाद, पौधों को नियमित रूप से पानी दें। जब पौधे 10 से 15 सेंटीमीटर ऊंचे हो जाएं, तो उन्हें मुख्य खेत में रोपाई करें।

कपूर कचरी की खेती में मुख्य खेत में रोपाई ( Transplanting in the Main Field in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) के लिए ढीली और अच्छी तरह से सूखा मिट्टी वाला मुख्य खेत तैयार करें। खेत में अच्छी मात्रा में जैविक खाद मिलाएं। पौधों को 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपाई करें। रोपाई के बाद, पौधों को हल्के से पानी दें।

कपूर कचरी की खेती में देखभाल और रखरखाव (Care and Maintenance in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) को नियमित रूप से पानी दें, खासकर सूखे के मौसम में। खरपतवारों को नियमित रूप से हटा दें। कपूर कचरी को साल में दो बार, मानसून से पहले और बाद में खाद दें। कपूर कचरी को कीटों और रोगों से बचाएं।

कपूर कचरी की खेती में खाद और सिंचाई ( Fertilizer and Irrigation in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) की खेती में खाद का महत्वपूर्ण योगदान होता है। खाद से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों की वृद्धि बेहतर होती है। गोबर की खाद सबसे अच्छी खादों में से एक है। यह मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाता है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। कम्पोस्ट भी एक अच्छी खाद है। यह जैविक कचरे से तैयार किया जाता है।

कपूर कचरी  (Kapoor Kachri) को नियमित रूप से सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई की मात्रा मिट्टी की जलधारण क्षमता और मौसम पर निर्भर करती है। गर्मियों में अधिक और सर्दियों में कम सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई विधि का प्रयोग करना सबसे अच्छा होता है। ड्रिप सिंचाई विधि से पानी की बचत होती है और पौधों की जड़ों तक पानी आसानी से पहुंचता है।

खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच करवा लें। खाद को मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें। सिंचाई करते समय पानी को जड़ों तक पहुंचने दें। सिंचाई के बाद खेत में पानी का जमाव न होने दें। बारिश के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है।

कपूर कचरी की खेती में उपज ( Yield in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) की उपज कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि किस्म, जलवायु, मिट्टी, खाद और सिंचाई, रोग और कीट आदि।

कपूर कचरी की औसत उपज 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर होती है। कुछ किस्मों में 20 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

उपज बढ़ाने के लिए अच्छी किस्म का चयन करें। उचित जलवायु और मिट्टी में खेती करें। उचित खाद और सिंचाई करें। रोग और कीटों से बचाव करें।

कपूर कचरी की खेती में कटाई (Harvesting in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी की कटाई रोपण के 18 से 24 महीने बाद की जा सकती है। कटाई का सही समय पौधों की वृद्धि और विकास पर निर्भर करता है। कपूर कचरी की कटाई आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर में की जाती है। इस समय पौधों की पत्तियां पीली हो जाती हैं और प्रकंदों में आवश्यक तेलों की मात्रा अधिक होती है।

कटाई के लिए फावड़े का प्रयोग करें। प्रकंदों को जड़ों से सावधानीपूर्वक निकालें। प्रकंदों को मिट्टी से अच्छी तरह से साफ करें। प्रकंदों को धूप में सुखाएं। प्रकंदों को पूरी तरह से सूखने में 10-15 दिन लगते हैं। सूखे प्रकंदों को हवाबंद डिब्बे में स्टोर करें। प्रकंदों को ठंडी और सूखी जगह पर रखें। कटाई के समय पौधों की जड़ों को नुकसान न पहुंचाएं।

कपूर कचरी की खेती करने वाले राज्य ( Kapoor Kachri Cultivation States )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) की खेती किसानों के लिए आय का एक अच्छा स्रोत है। भारत में, कपूर कचरी (Kapoor Kachri) की खेती हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, और उत्तर पूर्वी राज्यों में की जाती है।

इन राज्यों में, कपूर कचरी की खेती 1000-2000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में की जाती है। इन क्षेत्रों में ठंडी जलवायु और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी होती है, जो कपूर कचरी की खेती के लिए अनुकूल होती है।

हिमाचल प्रदेश में, कपूर कचरी की खेती कुल्लू, चंबा, और किन्नौर जिलों में की जाती है। इन जिलों में कपूर कचरी को “कचूर” के नाम से जाना जाता है।

उत्तराखंड में, कपूर कचरी की खेती गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में की जाती है। इन मंडलों में कपूर कचरी को “कपूर” के नाम से जाना जाता है।

जम्मू और कश्मीर में, कपूर कचरी की खेती कश्मीर घाटी और लद्दाख क्षेत्र में की जाती है। इन क्षेत्रों में कपूर कचरी को “कपूर कचरा” के नाम से जाना जाता है।

सिक्किम में, कपूर कचरी की खेती पूरे राज्य में की जाती है। सिक्किम में कपूर कचरी को “कपूर कचरा” के नाम से जाना जाता है।

पश्चिम बंगाल में, कपूर कचरी की खेती दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों में की जाती है। इन जिलों में कपूर कचरी को “कपूर कचरा” के नाम से जाना जाता है।

उत्तर पूर्वी राज्यों में, कपूर कचरी की खेती अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, और त्रिपुरा में की जाती है। इन राज्यों में कपूर कचरी को विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है।

कपूर कचरी की खेती में लागत और कमाई ( Cost and Earning in Kapoor Kachri Cultivation )

कपूर कचरी (Kapoor Kachri) एक औषधीय पौधा है जो कम लागत और कम देखभाल वाली खेती के लिए जाना जाता है। यह कम पानी वाली मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, जिससे यह किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन जाता है।

कपूर कचरी की बाजार में अच्छी मांग है और इसकी खेती से अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। कपूर कचरी की खेती में फसल तैयार होने में 2 से 3 साल लगते हैं। 

कपूर कचरी की खेती में लागत ( Cost in Kapoor Kachri Cultivation )

बीज: 1 किलोग्राम कपूर कचरी (Kapoor Kachri) के बीज की कीमत ₹2000 से ₹3000 होती है। 1 हेक्टेयर में 10 से 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

भूमि: भूमि की तैयारी, जुताई, और खाद डालने में ₹5000 से ₹10000 प्रति हेक्टेयर खर्च आता है।

सिंचाई: कपूर कचरी को नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई में ₹5000 से ₹10000 प्रति हेक्टेयर खर्च आता है।

कीट नियंत्रण: कीटों और रोगों से बचाव के लिए ₹2000 से ₹5000 प्रति हेक्टेयर खर्च आता है।

कटाई और थ्रेसिंग: कटाई और थ्रेसिंग में ₹5000 से ₹10000 प्रति हेक्टेयर खर्च आता है।

इस प्रकार कपूर कचरी (Kapoor Kachri) की खेती में कुल अनुमानित लागत ₹30000 से ₹50000 प्रति हेक्टेयर होती है।

कपूर कचरी की खेती में कमाई ( Earning in Kapoor Kachri Cultivation )

उपज: 1 हेक्टेयर से 10 से 15 टन कपूर कचरी की उपज प्राप्त होती है।

कीमत: कपूर कचरी की बाजार में कीमत ₹50 से ₹100 प्रति किलोग्राम होती है।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How Can You Take Help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।

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