रागी का उपयोग, फायदा एवं रागी की खेती

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रागी (Ragi) एक प्राचीन अनाज है जिसकी खेती हजारों सालों से भारत, अफ्रीका और एशिया के अन्य हिस्सों में की जा रही है। इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि मंडुआ, मड़ुआ, राघी, और एलुसिन कोराकाना।

रागी का इतिहास 4000 साल पुराना माना जाता है। इसकी उत्पत्ति अफ्रीका के इथियोपिया और इरिट्रिया के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हुई थी। धीरे-धीरे, यह एशिया और भारत में फैल गया।

भारत में रागी की खेती लगभग 2000 साल पहले शुरू हुई थी। यह कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा उगाया जाता है। रागी भारत के आदिवासी समुदायों के बीच भी एक लोकप्रिय अनाज है।

रागी में पाए जाने वाले पोषक तत्व ( Nutrients Found in Ragi )

रागी एक अद्भुत अनाज है जो पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें प्रोटीन (Protein), फाइबर (Fiber), कैल्शियम (Calcium), आयरन (Iron), मैग्नीशियम (Magnesium) और एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidants) की मात्रा अधिक होती है। रागी में फास्फोरस (Phosphorus), जिंक (Zinc), विटामिन (Vitamin) B6 और फोलेट (Folate) भी पाए जाते हैं, जो इसे एक संपूर्ण भोजन बनाते हैं।

रागी के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य लाभ ( Health Benefits of Consuming Ragi )

रागी के सेवन से होने वाले कुछ प्रमुख स्वास्थ्य लाभों में शामिल हैं।

  1. रागी में प्रोटीन की मात्रा अन्य अनाजों की तुलना में अधिक होती है। यह मांसपेशियों के निर्माण और विकास के लिए आवश्यक है।
  2. रागी में फाइबर की मात्रा भी अधिक होती है। यह पाचन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने और वजन घटाने में मदद करता है।
  3. रागी कैल्शियम का एक अच्छा स्रोत है, जो हड्डियों और दांतों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
  4. रागी में आयरन की मात्रा भी अच्छी होती है। यह एनीमिया को रोकने में मदद करता है।
  5. रागी में मैग्नीशियम की मात्रा भी अच्छी होती है। यह हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और मांसपेशियों को आराम देने में मदद करता है।
  6. रागी में एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा भी अच्छी होती है। यह शरीर को मुक्त कणों से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करता है।

रागी की खेती ( Ragi Cultivation )

रागी एक अत्यंत पौष्टिक और स्वादिष्ट अनाज है जो भारत के विभिन्न राज्यों में उगाया जाता है। यह कम पानी वाली फसल होने के कारण, कम उपजाऊ मिट्टी में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। रागी की खेती अपेक्षाकृत सरल है, जिसके कारण यह किसानों के बीच लोकप्रिय है।

रागी की खेती में जलवायु (Climate in Ragi Cultivation)

रागी की विभिन्न किस्में अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में अच्छी तरह से बढ़ सकती हैं। रागी की बुवाई का उचित समय जलवायु पर निर्भर करता है। रागी की सफल खेती के लिए उचित जलवायु महत्वपूर्ण है। तापमान, वर्षा, आर्द्रता, धूप और हवा जैसे कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

रागी 20 से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान में पनपती है। इससे कम या ज्यादा तापमान फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। रागी को 500 से 900 मिमी वर्षा की आवश्यकता होती है। मानसून की बारिश सबसे अच्छी है। भारी वर्षा और जलभराव रागी के लिए हानिकारक है।

रागी 60 से 70% की आर्द्रता में अच्छी तरह से बढ़ती है। कम आर्द्रता पत्तियों को सुखा सकती है और अधिक आर्द्रता रोगों का कारण बन सकती है। रागी को धूप की आवश्यकता होती है, लेकिन अत्यधिक धूप हानिकारक है। सुबह और शाम की हल्की धूप सबसे अच्छी है। रागी को हवादार जगह पसंद है। हवा रागी को मजबूत बनाती है और रोगों से बचाती है।

रागी की खेती में मिट्टी (Soil in Ragi Cultivation)

रागी की सफल खेती के लिए मिट्टी का चयन महत्वपूर्ण है। जल निकासी, उपजाऊपन और पीएच जैसे कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है। रागी एक बहुमुखी फसल है जो विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन यह अच्छी उपज के लिए जल निकासी वाली और उपजाऊ मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ती है। रागी की खेती दोमट मिट्टी, बलुई मिट्टी और चिकनी मिट्टी में भी की जा सकती है। रागी 5.5 से 7.0 के पीएच वाली मिट्टी में अच्छी तरह से बढ़ती है। रागी की खेती में जलभराव वाली मिट्टी, कम उपजाऊ मिट्टी, अम्लीय मिट्टी, क्षारीय मिट्टी और भारी मिट्टी उपयुक्त नहीं है।

रागी की खेती में मिट्टी की तैयारी (Soil Preparation in Ragi Cultivation)

रागी की बुआई से पहले मिट्टी को ठीक से तैयार करना जरूरी है।  जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी एवं भुरभुरी बना लेना चाहिए। खर-पतवार हटा देना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो मिट्टी में खाद एवं उर्वरक मिला देना चाहिए

रागी की खेती में बुवाई (Sowing in Ragi cultivation)

बुवाई से पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार करें। उर्वरक और जैविक खाद का प्रयोग करें। रोगों और कीटों से बचाव के लिए उचित उपाय करें। जून से जुलाई तक मानसून की बारिश के दौरान बुवाई की जाती है। कुछ क्षेत्रों में, अगस्त तक भी बुवाई की जा सकती है। बुआई के लिए उन्नत किस्मों के बीज का चयन करें। बीज को 24 घंटे तक पानी में भिगोने से अंकुरण दर बढ़ जाती है।

रागी की बुआई सीधी बुआई या रोपाई विधि से की जा सकती है। सीधी बुवाई में बीज को सीधे खेत में बोया जाता है। बीज पंक्तियों में बोये जाते हैं तथा पंक्तियों के बीच की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर होती है। बीज के बीच की दूरी 5 से 7 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। बीज 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोए जाते हैं।

रोपाई विधि में सबसे पहले बीज को नर्सरी में बोया जाता है। जब पौधे 20 से 25 दिन के हो जाएं तो उन्हें खेत में रोप दिया जाता है। पौध के बीच की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। बुआई के बाद खेत में हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई करना महत्वपूर्ण है।

रागी की खेती में बीज (Seeds in Ragi Cultivation)

रागी की खेती में बीज महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रागी के बीज छोटे, गोल और भूरे रंग के होते हैं। रागी की बुवाई के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना महत्वपूर्ण है। बीज अच्छी गुणवत्ता वाले, प्रमाणित और रोग मुक्त होने चाहिए। बीजों का अंकुरण प्रतिशत 80% से अधिक होना चाहिए।

रागी की बुवाई के लिए बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किलोग्राम होती है।

यदि आप रोपाई विधि से रागी की खेती करते हैं, तो बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर 2 से 3 किलोग्राम होती है। रागी के बीजों को बीज भंडार से खरीदा जा सकता है। रागी के बीजों को घर पर भी संरक्षित किया जा सकता है। रागी के बीजों को ठंडी और सूखी जगह पर रखना चाहिए। रागी के बीजों को कीड़ों और चूहों से बचाना चाहिए।

रागी की खेती में खाद और सिंचाई (Fertilizer and Irrigation in Ragi cultivation)

रागी को उर्वरक एवं सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। जैविक उर्वरकों में गोबर की खाद, कम्पोस्ट और हरी खाद शामिल हैं। नाइट्रोजन और फास्फोरस युक्त उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। रागी की खेती में उर्वरक और सिंचाई महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रागी की अच्छी फसल लेने के लिए उचित मात्रा में उर्वरक और सिंचाई करना आवश्यक है। रागी को केवल प्रारंभिक अवस्था में सिंचाई की आवश्यकता होती है, और बाद में यह मानसून की बारिश पर निर्भर करती है।

रागी की खेती में सिंचाई का समय बुवाई के बाद, अंकुरण के बाद, फूल आने से पहले   और दाना भरने के समय की कटी है। रागी की खेती में सिंचाई का तरीका बाढ़ विधि, क्यारी विधि और फव्वारा विधि से जाती है।

सिंचाई का समय और तरीका मिट्टी, जलवायु और फसल की अवस्था के अनुसार होना चाहिए। सिंचाई का समय और तरीका मिट्टी, जलवायु और फसल की अवस्था के अनुसार होना चाहिए। खाद और सिंचाई रागी की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं। खाद पौधों को पोषक तत्व प्रदान करती है। उचित खाद और सिंचाई से फसल की पैदावार और गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

रागी की खेती में निराई-गुड़ाई (Weeding in Ragi cultivation)

खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई आवश्यक है। यह खरपतवारों को नियंत्रित करने और फसल को स्वस्थ रखने में मदद करता है। रागी की बुआई के बाद पहली निराई-गुड़ाई 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए। खरपतवारों को नियंत्रित करता है।  रागी की पहली निराई-गुड़ाई 30 से 40 दिन बाद करनी चाहिए। मिट्टी को ढीला करता है। हवा और पानी को जड़ों तक पहुँचने में मदद करता है। फसल की वृद्धि और विकास को बढ़ावा देता है। बीमारियों और कीटों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

निराई-गुड़ाई करते समय सावधानी बरतें ताकि रागी के पौधों को नुकसान न पहुंचे। निराई-गुड़ाई के दौरान मिट्टी को बहुत गहराई तक न खोदें। बारिश के बाद निराई-गुड़ाई न करें। यदि खरपतवार बहुत अधिक हैं, तो रासायनिक खरपतवारनाशकों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जाना चाहिए।

रागी की खेती में रोग और कीट (Diseases and Pests in Ragi Cultivation)

रागी की खेती कई बीमारियों और कीटों से प्रभावित हो सकती है, जो फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। रागी की खेती में रोग और कीटों का संक्रमण एक बड़ी समस्या हो सकती है। बीमारियों और कीटों से बचने के लिए उचित रोकथाम और नियंत्रण उपायों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है।

रागी की खेती में लगने वाले रोग एवं कीट इस प्रकार हैं –

  1. ब्लैक ब्लाइट: यह एक कवक रोग है जो पत्तियों और तनों को प्रभावित करता है।
  2. पत्ती धब्बा: यह एक कवक रोग है जिसके कारण पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं।
  3. जड़ सड़न: यह एक कवक रोग है जिसके कारण जड़ें सड़ जाती हैं।
  4. तना सड़न: यह एक जीवाणु रोग है जो तना सड़न का कारण बनता है।
  5. तना छेदक: यह एक कीट है जो तने में छेद कर फसल को नुकसान पहुंचाता है।
  6. पत्ती लपेटक: यह एक कीट है जो पत्तियों को लपेटता है, अंदर छिप जाता है और पत्तियों को खाता है।
  7. ब्राउन हॉपर: यह एक कीट है जो पत्तियां और दाने खाता है।
  8. तना मक्खी: यह एक कीट है जो तने में अंडे देता है और लार्वा तने को नुकसान पहुंचाता है।

रागी की खेती में रोग एवं कीट की रोकथाम एवं नियंत्रण (Prevention and Control of Diseases and Pests in Ragi Cultivation)

  1. प्रतिरोधी किस्मों का चयन: रोगों और कीटों के लिए प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना महत्वपूर्ण है।
  2. स्वच्छ खेती: खेत को साफ रखना और खरपतवारों पर नियंत्रण रखना महत्वपूर्ण है।
  3. उचित जल प्रबंधन: जलभराव से बचना महत्वपूर्ण है।
  4. उचित उर्वरक प्रबंधन: संतुलित उर्वरक का उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
  5. जैविक नियंत्रण: जैविक नियंत्रण एजेंटों का उपयोग करके कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है।
  6. रासायनिक नियंत्रण: यदि आवश्यक हो तो रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जाना चाहिए।

रागी की खेती में कटाई (Harvesting in Ragi Cultivation)

रागी की कटाई फसल पकने के बाद की जाती है। रागी की फसल 90 से 120 दिन में पक जाती है। रागी की कटाई के लिए उपयुक्त मौसम शुष्क मौसम है। फसल पकने के बाद दाने भूरे रंग के हो जाते हैं। यदि दाने हरे हैं, तो वे पूरी तरह से पके नहीं हैं और उनमें अतिरिक्त नमी है। इन बंडलों को 10 से 15 दिन तक धूप में सुखाया जाता है।

रागी की खेती में उपज (Yield in Ragi cultivation)

रागी की उपज कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें शामिल हैं:

रागी की कई किस्में हैं, जिनमें से कुछ की पैदावार अधिक होती है। रागी दोमट मिट्टी में अच्छी तरह उगती है। उचित उर्वरक और सिंचाई से रागी की पैदावार बढ़ती है। रोग एवं कीट बाजरे की उपज को कम कर सकते हैं। रागी की औसत उपज 10 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. कुछ किस्मों की उपज 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।

रागी की खेती में उपज बढ़ाने के तरीके (Ways to Increase Yield in Ragi Cultivation)

 रागी की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए जैविक खेती भी की जा सकती है। रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का चयन करना महत्वपूर्ण है। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना जरूरी है। रागी को जलभराव पसंद नहीं है, इसलिए उचित सिंचाई महत्वपूर्ण है। उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करना जरूरी है। बीमारियों और कीटों की रोकथाम के लिए उचित उपाय करना महत्वपूर्ण है। रागी की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अंतरफसल भी लगाई जा सकती है।

रागी की खेती में लाभ (Benefits of Ragi cultivation)

रागी की खेती एक लाभदायक और टिकाऊ कृषि पद्धति है। यह कम पानी, कम उपजाऊ मिट्टी तथा कम लागत वाली खेती के लिए उपयुक्त है। रागी एक पौष्टिक फसल है जो किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए फायदेमंद है।

कम पानी की आवश्यकता: रागी कम पानी की आवश्यकता वाली फसल है। इसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है। यह एक महत्वपूर्ण लाभ है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां पानी की कमी है।

कम उपजाऊ मिट्टी में भी खेती: रागी कम उपजाऊ मिट्टी में भी अच्छी तरह उग सकता है। यह उन किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण लाभ है जिनके पास उपजाऊ मिट्टी नहीं है।

कम लागत वाली खेती: रागी की खेती कम लागत वाली खेती है। इसे उगाने के लिए अधिक खाद, उर्वरक या कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती है। यह उन किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण लाभ है जिनके पास सीमित संसाधन हैं।

रागी की खेती करने वाले राज्य ( Ragi Cultivating States )

भारत में रागी की खेती कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, उत्तराखंड, झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में की जाती है। इन राज्यों में रागी मुख्य रूप से मानसून के मौसम में उगाई जाती है। रागी कम पानी वाली फसल है, इसलिए इसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है।

रागी की खेती में लागत और कमाई ( Cost and Earning in Ragi Cultivation )

रागी की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय हो सकती है। बाजार में रागी की अच्छी मांग है। रागी की पैदावार भी अच्छी होती है. रागी की खेती में मुनाफा 50 से 100 फीसदी तक हो सकता है। यह मुनाफा आपके क्षेत्र, खेती के तरीके, उपज और बाजार कीमत पर निर्भर करता है। आपके क्षेत्र और खेती के तरीके के आधार पर लागत और कमाई भिन्न हो सकती है।

रागी की खेती में लागत कई कारकों पर निर्भर करती है जिसमें बीज, खाद और उर्वरक, सिंचाई, श्रम, कृषि उपकरण, बीमा और अन्य खर्च शामिल हैं। रागी की खेती की औसत लागत ₹10,000 से ₹20,000 प्रति हेक्टेयर हो सकती है।

रागी की कमाई उपज और बाजार मूल्य सहित कई कारकों पर निर्भर करती है। रागी की खेती से औसत कमाई ₹60,000 प्रति हेक्टेयर हो सकती है।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How Can You Take Help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।

संपर्क

अधिक जानकारी के लिए हमसे संपर्क करें +91 9335045599 ( शबला सेवा )

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