तोरई का उपयोग, फायदा एवं तोरई की खेती

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तोरई ( Ridge Gourd ) का वानस्पतिक नाम लफ़ा एक्यूटांगुला ( Luffa acutangular ) है और यह कुकुर्बिटेसी ( Cucurbitaceae ) परिवार से संबंधित है। तोरई को कई नामों से भी जाना जाता है जैसे कि झिगानी, तरोई, तुरई ( Zucchini ) आदि। गुजरात में तुरिया ( Turiya ), घिसोडा ( Ghisoda ), तुरीन ( Turin ) आदि नाम से जाना जाता है।  नेपाल में रामतोरई ( Ramtorai ) के नाम से जाना जाता है। तमिल में पिरकान्कई ( Pirkankai ), पिकून्कई ( Pikunkai ), पेयप्पीचुक्कू ( Peyppichukku ) बंगाली में घोषा लता ( Ghosha lata ), झिंगा (Jhinga ) उड़ीसा में जान्ही ( Janhi ) आदि नाम से जाना जाता है। तोरई एक बेल वाली फसल है, जो ग्रीष्म ऋतु एवं रबी फसल के मौसम में देश के कई स्थानों पर सफलतापूर्वक लगाई जाती है। इसे बिहार में नेनुआ भी कहा जाता है। इसके नर और मादा फूल एक ही बेल पर अलग-अलग जगह और अलग-अलग समय पर खिलते हैं। नर फूल पहले और गुच्छों में लगते हैं जबकि मादा फूल अकेले और बेल की शाखाओं पर लगते हैं। फूल का रंग चमकीला पीला और आकर्षक होता है। इसके फूल शाम 5 से 8 बजे तक खिलते हैं। जीवित और सक्रिय परागकण नर फूलों से फूल आने के दौरान प्राप्त होते हैं। तोरई का परागण मधुमक्खियों द्वारा पूरा किया जाता है।

सूखी तोरई अथवा प्राकृतिक लूफा का इस्तेमाल कैसे करें ( How to Use Dry Ridge Gourd or Natural Loofah )

तोरई का उपयोग हर तरह से किया जा सकता है, जैसे इसका हरा रूप खाने के लिए और इसका रस तरल रूप में पीने से स्वस्थ रहने के लिए और ठोस सूखा रूप ( प्राकृतिक लूफा ) नहाने और दैनिक जीवन के अन्य कार्यों के लिए। आज के आधुनिक युग में नहाने के लिए लूफा का इस्तेमाल किया जाता है, जो हमारे शरीर को साफ रखने में मददगार साबित होता है लेकिन बदलते समय के साथ लोग प्राकृतिक लूफा ( Natural Loofah ) का इस्तेमाल बहुत करने लगे हैं, जो पौधों और विभिन्न सब्जियों को सुखाकर तैयार किया जाता है जिनमे तोरई का लूफा बहुत प्रसिद्ध है। लूफा में औषधीय गुण होने के कारण लूफा का इस्तेमाल नहाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में बर्तन धोने और कपड़े रगड़ने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है। लूफा का इस्तेमाल गद्दों को  भरने के लिए होता है। इसके अलावा लूफा का उपयोग बहुत जगह आभूषण बनाने में, पेंट करने के लिए, पानी को साफ करने के लिए और सजावट को मनमोहक बनाने में होता है। लूफा का उपयोग सैनिकों के हेलमेट को अंदर से नरम करने के लिए भी किया जाता है।

तोरई में पाए जाने वाले पोषक तत्व ( Nutrients Found in Ridge Gourd )

तोरई में स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए कार्बोहाइड्रेट ( Carbohydrate ), प्रोटीन ( Protein ), वसा ( Fat ), फाइबर ( Fiber ), विटामिन ( Vitamin ) B1, विटामिन B2, विटामिन B3, विटामिन B6, विटामिन C जैसे कई पोषक तत्व और सोडियम ( Sodium ), आयरन ( Iron ), पोटेशियम ( Potassium ), कैल्शियम ( Calcium ), मैग्नीशियम ( Magnesium ) जैसे खनिज भी होते हैं। इसमें कई अन्य बायोएक्टिव घटक ( Bioactive Components ) भी होते हैं।

तोरई के सेवन से होने वाले स्वास्थ्यवर्धक फायदे ( Health Benefits of Consuming Ridge Gourd )

आयुर्वेद के अनुसार तोरई पचाने में आसान, पेट के लिए थोड़ी गर्म होती है। तोरई कफ और पित्त को शांत करती है। तोरई के सेवन से घाव भरता है, पेट साफ़ करता है, भूख बढ़ती है और हृदय स्वस्थ रहता है। इतना ही नहीं, यह कुष्ठ, पीलिया, प्लीहा रोग, सूजन, गैस, कृमि, सुजाक, सिर के रोग, घाव, पेट के रोग, बवासीर में भी उपयोगी है। कृत्रिम जहर, दमा, सूखी खांसी, बुखार को ठीक करता है।

1. तोरई का सेवन मधुमेह में फायदेमंद होता है।
2. पेट के रोगों में तोरई का सेवन फायदेमंद होता है।
3. पीलिया रोग में तोरई का सेवन फायदेमंद होता है।
4. तोरई का सेवन अस्थमा के इलाज में मदद करता है।
5. तोरई में कैंसररोधी गुण होने के कारण यह कैंसर में फायदेमंद है।
6. तोरई का सेवन हृदय रोग के लक्षणों से राहत दिलाने में मदद करता है।
7. तोरई के सेवन से त्वचा की जलन, खुजली आदि विकार ठीक हो जाते हैं।
8. तोरई का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
9. तोरई में पाए जाने वाले बीटा कैरोटीन तत्व के कारण यह आंखों के लिए अच्छा होता है।
10. तोरई में सोडियम की मात्रा कम होने के कारण यह उच्च रक्तचाप को कम करने या नियंत्रित करने में भी मदद करती है।

तोरई की खेती ( Ridge Gourd Cultivation )

तोरई की खेती पुरे भारत में की जाती है। यह बेल पर लगने वाली सब्जी होती है। इसकी सब्जी की भारत में छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों में मांग है। गर्मियों के दिनों में बाज़ार में इसकी मांग बहुत होती है, इसलिए किसानों के लिए इसकी खेती करना बहुत लाभदायक है।

तोरई की खेती में मिट्टी, तापमान एवं जलवायु ( Soil, Temperature and Climate in Ridge Gourd Cultivation )

वैसे तो तोरई सब तरह भूमि में उगाया जा सकता है। अच्छी उपज के लिए जैविक तत्वों वाली हल्की दोमट भूमि उत्तम मानी गई है। खेत से जल निकासी का उचित प्रबंध होनी चाहिए। तोरई की खेती के लिए मिट्टी का पी एच मान 6 से 7 के बीच होना चाहिए। नदियों के किनारे वाली जमीन इसकी खेती इसके लिए उपयुक्त रहती है। तुरई की अच्छी फसल के लिए कार्बनिक पदार्थ से भरपूर उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है। तोरई की फसल के लिए 20 डिग्री से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उचित होता है। इसके पौधे शुष्क और आर्द्र जलवायु में अच्छे से विकास करते हैं। इसके पौधे अधिक ठंडी जलवायु को सहन नहीं कर पाते।

तोरई की खेती में मिट्टी की तैयारी, बुवाई का समय और बुवाई की विधि ( Soil Preparation, Sowing Time and Sowing Method in Ridge Gourd Cultivation )

तोरई की खेती के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने के बाद करें, जिससे खेत में मौजूद खरपतवार और कीड़े नष्ट हो जाएंगे। खेत तैयार करते समय खेत में आवश्यकता के अनुसार सड़ी हुई गोबर की खाद डालें। खाद डालने के बाद खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें। इसके बाद खेत की 2 से 3 बार कल्टीवेटर से जुताई करके उस पर पाटा लगाकर खेत को समतल कर लें। तुरई की खेती मार्च में गर्मी के मौसम के लिए उपयुक्त है, जबकि जून से जुलाई तक का समय खरीफ की फसल के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। ग्रीष्म ऋतु में बुवाई के लिए बीजों को 24 घंटे तक पानी में भिगोकर बोरे में लपेटकर रखना चाहिए। इससे जमाव अच्छा व शीघ्र होता है। बुवाई के लिए तैयार खेत में लगभग 3 मीटर चौड़ी क्यारियाँ बनाई जाती हैं और प्रत्येक दो क्यारियों के बीच लगभग 2 फीट चौड़ी नाली बनाई जाती है। एक ही स्थान पर गड्ढे के दोनों सिरों पर 2 फीट की दूरी पर 3 से 4 बीज बोये जाते हैं। बीज में जमाव के बाद एक जगह पर केवल एक या दो स्वस्थ पौधों को रखते हैं। बाकी कमजोर पौधे हटा दिए जाते हैं।

तोरई की उन्नत प्रकार की किस्में ( Improved Varieties of Ridge Gourd )

तोरई की फसल से अच्छी पैदावार पाने के लिए आप इन किस्मों का चयन कर सकते हैं।

तोरई की देसी किस्मों में पूसा नासदार, अर्का सुमित, अर्का सुजात, सतपुतिया, पंजाब सदाबहार, कल्याणपुर, धारीदार, कोयंबटूर-1, पी के एम-1 आदि हैं।

तोरई की उन्नत किस्मों में घिया तोरई, पूसा चिकनी, पूसा सुप्रिया, काशी दिव्या, पूसा स्नेहा, कल्याणपुर चिकनी, फुले प्रजातका, पूसा नसदन, सतपुतिया, कोयम्बू-2 आदि शामिल हैं।

संरचना के आधार पर तोरई 3 प्रकार की होती है ( There are 3 types of Ridge Gourd on the Basis of Structure. )

  1. चिकनी लंबी तोरई ( Smooth Long Ridge Gourd ) अथवा काली-हरी तोरई ( Black-Green Ridge Gourd ) – लूफा की बहुत ज्यादा मांग और लोकप्रिय तोरई होने के कारण इस तोरई की खेती भारत के अलावा विदेशों में भी होती है। इसका बीज भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है।                                                                         
  2. लंबी उभरी धारियों तोरई ( Long Ridged Ridge Gourd ) – इसकी खेती भारत में की जाती है। इसमें लगभग 5 मिलीमेटर ऊपर उठी हुई धारियाँ होती हैं।                                                                      
  3. छोटी गोल सतपुतिया तोरई अथवा झुमकुल ( Small Round Ridge Gourd or Jhumkul ) – छोटी गोल सतपुतिया तोरई/तुरई जिसका बुन्देलखण्ड नामक क्षेत्र में स्थानीय नाम झुमकुल के नाम पर है। अपने छोटे आकार के कारण यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है और खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है। झुमकुल तोरई 1.5 इंच से 3 इंच लंबी और लगभग 1.5 इंच चौड़ी होती है। यह तुरई प्रजाति में सबसे छोटी तोरई/तुरई है। यह तोरई/तुरई बुन्देलखण्ड क्षेत्र में ज्यादा पाई जाती है। इस तोरई के बारे में आप शबला सेवा संस्थान के माध्यम से भी जान सकते हैं।

तोरई की खेती में बीज की मात्रा एवं बीज का उपचार ( Quantity of Seeds and Treatment of Seeds in Ridge Gourd Cultivation )

काली तोरई की खेती में प्रति हेक्टेयर लगभग 4 से 5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। चिकनी तोरई की खेती में प्रति हेक्टेयर लगभग 2.5 से 3.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बीज के अंकुरण का प्रतिशत बढ़ाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार करना चाहिए लेकिन बुआई के लिए संकर ( हाइब्रिड ) बीज को उपचारित करने की आवश्यकता नहीं है। तोरई के संकर बीज को आप सीधे बो सकते हैं। बीज जब घर पर तैयार किया जाये तो बीज को उपचारित करना आवश्यक है। इससे बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है।

तोरई की खेती में खाद एवं उर्वरक की मात्रा ( Amount of Manure and Fertilizer in Ridge Gourd Cultivation )

कृषि भूमि में 15 से 20 तक गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर कि दर से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। तोरई को 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 से 40 किलोग्राम फास्फोरस और लगभग 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा के समय ही समान रूप से मिट्टी में मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की बची हुई शेष मात्रा लगभग 45 दिन बाद पौधों की जड़ों के पास डालकर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए।

तोरई की खेती में सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई कब करें ( When to Do Irrigation and Weeding in Ridge Gourd Cultivation )

गर्मियों में बिजाई के तुरंत बाद थोड़े-थोड़े अंतराल पर दो या तीन बार सिंचाई करानी चाहिए ताकि बीज उग जाये। इसके बाद 7 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। वर्षा ऋतु में वर्षा न होने पर विशेष चयन करना आवश्यक है, सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि पानी बिजाई के साथ से नीचे रहे। जब बेले काफी बड़ी हो जाए, तो स्लीपर उत्पादों को उतार दें ताकि वह उनमें उलझ न जाए। नालियों की गुड़ाई करके पौधों की जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाना लाभप्रद है।

तोरई की खेती में तुड़ाई का समय ( Harvesting time in Ridge Gourd Cultivation )

फसल बुआई के 50 से 60 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। 3 से 4 दिन के अंतराल पर तुड़ाई करें। मुलायम और मध्यम आकार के फलों की तुड़ाई करनी चाहिए। तोड़ते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बेलों को कोई हानि न हो। जब काली तोरई की लंबाई 20 से 25 सेंटीमीटर हो तब भी तोड़ सकते हैं।

सूखी तोरई, लूफा क्या है और लूफा कैसे प्राप्त करें ( What is Dry Ridge Gourd, Loofah and How to Get Loofah )

कोई भी हरा तोरई जो तोड़ने योग्य नहीं हो, उसको सूखने के लिए छोड़कर  दें। हरी तोरई से लूफा प्राप्त करने के लिए इसे पौधे से न तोड़ें, बल्कि इसे पौधे में ही सूखने दें। पूरी तरह से पकने के बाद तोरई सूख जाती है फिर इसे तोड़ लें और दोनों सिरे काट कर पानी में भिगो दें जिससे ऊपर की ठोस परत कमजोर हो जाये और उस परत ( छिलका ) को हटाया जा सके। जब यह नरम हो जाए तो इसका छिलका और बीज निकाल लें, फिर इसे अच्छे से सुखा लें। इसके बाद लूफा तैयार है। ध्यान रहे कि लूफा के आसपास नमीं रहनी चाहिए नहीं तो लूफा खराब हो सकता है।

तोरई की खेती करने वाले राज्य ( Ridge Gourd Cultivating States )

वैसे तो भारत के सभी स्थानों जैसे- बिहार, सिक्किम, असम, तमिलनाडू एवं उत्तर-पश्चिमी हिमालयी आदि भागों में इसकी खेती की जाती है लेकिन मध्यप्रदेश, केरल, उड़ीसा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश आदि राज्य इसके उत्पादन में अग्रणी भूमिका निभाते है। बाजार में तोरई की मांग को देखते हुए यदि इसकी खेती जैविक तरीके से की जाए तो किसान तोरई की खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते है।

तोरई की खेती में लागत एवं कमाई ( Cost and Earning in Ridge Gourd Cultivation )

तुरई/तरोई/तोरई की पैदावार उसकी किस्म पर निर्भर करती है। अगर तुरई की खेती के लिए उन्नत किस्म का चयन किया जाए और उसे जैविक तरीके से उगाया जाए तो उपज लगभग 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। अगर हम तुरई/ तरोई/तोरई की खेती की लागत की बात करें तो बुआई से लेकर कटाई तक की कुल लागत लगभग 30,000 प्रति हेक्टेयर रुपये आती है और तुरई/तरोई/तोरई की खेती में कमाई तो लागत निकालकर प्रति हेक्टेयर 4 लाख रुपये का फायदा होगा।

बहुत बार किसानों को तोरई की अधिक कीमत नहीं मिल पाती है, जिसके कारण किसान इसे तोड़ते भी नहीं हैं। बेल में लगी होने के कारण तोरई पककर सूख जाती है। बाद में सूखी तोरई फेंक दिया जाता है लेकिन अब किसान सूखी तोरई ( लूफा ) को इकट्ठा करके बेच सकते हैं। इस तरह से किसान अब दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं। इसके बीज निकालने के बाद इसे बाजार में भी बेचा जा सकता है। तोरई के बीज भी बेचकर कमाई की जा सकती है। विदेशों में लूफा के एक पीस की कीमत 20 डॉलर यानी करीब 1600 भारतीय रुपये है। भारत के बड़े शहरों में इसकी कीमत लगभग 100 रुपये प्रति पीस है।

आप शबला सेवा की मदद कैसे ले सकते हैं? ( How Can You Take Help of Shabla Seva? )

  1. आप हमारी विशेषज्ञ टीम से खेती के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  2. हमारे संस्थान के माध्यम से आप बोने के लिए उन्नत किस्म के बीज प्राप्त कर सकते हैं।
  3. आप हमसे टेलीफोन या सोशल मीडिया के माध्यम से भी जानकारी और सुझाव ले सकते हैं।
  4. फसल को कब और कितनी मात्रा में खाद, पानी देना चाहिए, इसकी भी जानकारी ले सकते हैं।
  5. बुवाई से लेकर कटाई तक, किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर आप हमारी मदद ले सकते हैं।
  6. फसल कटने के बाद आप फसल को बाजार में बेचने में भी हमारी मदद ले सकते हैं।

संपर्क

अधिक जानकारी के लिए हमसे संपर्क करें +91 9335045599 ( शबला सेवा )

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